भगवान श्री कृष्ण के पोते से हो गया इस युवती को प्रेम, अनिरुद्ध और उषा…

प्रेम असीम है। प्रेम पूजा है। प्रेम वरदान है। प्रेम की कोई जाति नहीं, प्रेम की भाषा नहीं, प्रेम का कोई परिवार नहीं। उन्मुक्त है प्रेम, स्वच्छंद है प्रेम। हम सभी जानते हैं कि हिंदू धर्म में ब्रह्मा, विष्णु और महेश को सर्वोच्च माना गया है। द्वापर युग में भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में धरती पर अवतार लिया था। क्या आपको पता है कि एक बार श्रीकृष्ण और महेश यानी भगवान शिव के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया था। युद्ध की वजह श्रीकृष्ण के पोते अनिरुद्ध और असुरों के राजा बाणासुर की कन्या उषा की प्रेम कहानी थी। आप भी जानिए यह कहानी। 

सपने में देखकर दिल दे बैठी

महाभारत युद्ध के बाद श्रीकृष्ण द्वारिका नगरी में जाकर बस गए थे। उनके कई पुत्र हुए, जिनमें से एक था प्रद्युम्न। प्रद्युम्न के बेटे का नाम अनिरुद्ध था। असुरराज बाणासुर की बेटी उषा ने एक बार अनिरुद्ध को सपने में देखा और उसे दिल दे बैठी। वह किसी भी हालत में अनिरुद्ध से विवाह करना चाहती थी।

हिंदू धर्म में ब्रह्मा, विष्णु और महेश को सर्वोच्च माना गया है। द्वापर युग में भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में धरती पर अवतार लिया था। क्या आपको पता है कि एक बार श्रीकृष्ण और महेश यानी भगवान शिव के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया था। युद्ध की वजह श्रीकृष्ण के पोते अनिरुद्ध और असुरों के राजा बाणासुर की कन्या उषा की प्रेम कहानी थी। यहां पढ़िए अनोखी पौराणिक कथा-

महाभारत युद्ध के बाद श्रीकृष्ण द्वारिका नगरी में जाकर बस गए थे। उनके कई पुत्र हुए, जिनमें से एक था प्रद्युम्न। प्रद्युम्न के बेटे का नाम अनिरुद्ध था। असुरराज बाणासुर की बेटी उषा ने एक बार अनिरुद्ध को सपने में देखा और उसे दिल दे बैठी। वह किसी भी हालत में अनिरुद्ध से विवाह करना चाहती थी।

उषा ने अपनी मायावी सहेली चित्रलेखा को द्वारिका भेजा। चित्रलेखा रात के अंधेरे में श्रीकृष्ण के महल में घुस गई। अनिरुद्ध उस समय अपने कमरे में सो रहा था। चित्रलेखा उसे पलंग समेत उठाकर वहां से ले गई और उसका अपहरण कर सीधे हिमालय में ओखीमठ के पास ले गई। उषा भी वहां पहुंच गई। जब अनिरुद्ध की नींद खुली तो वह चौंक गया। तब उषा ने पूरा कहानी बताई। अनिरुद्ध भी उषा की सुंदरता से मोहित हो गया। फिर दोनों ने वहीं पर गंधर्व विवाह कर लिया।

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दूसरी ओर बाणासुर को इसकी खबर लगी तो अनिरुद्ध को पकड़कर कारावास में डाल दिया। श्रीकृष्ण को इसकी खबर लगी तो वह अपनी सेना लेकर बाणासुर के इलाके में पहुंच गए। दूसरी ओर, बाणासुर को भगवान शिव से वरदान प्राप्त था। शिवजी ने उसे रक्षा का वचन दिया था। कृष्ण द्वारा आक्रमण की खबर मिलते ही बाणासुर ने शिव की आराधना की। इसके बाद शिवजी अपनी सेना के साथ बाणासुर की रक्षा करने के लिए पहुंच गए।

कृष्ण और शिव की सेना के बीच हुआ भयंकर युद्ध

श्रीकृष्ण और शिवजी की सेनाओं के बीच युद्ध शुरू हो गया। श्रीकृष्ण ने बाणासुर के ढेरों सैनिकों का वध कर दिया। शिवजी ने भी श्रीकृष्ण के कई सैनिकों को नुकसान पहुंचाया। दोनों सेनाओं के बीच भयंकर युद्ध चल रहा था, तभी श्रीकृष्ण ने निद्रास्त्र छोड़ दिया। इससे शिवजी गहरी नींद में चले गए। श्रीकृष्ण ने इसका फायदा उठाया और बाणासुर पर ताबड़तोड़ वार शुरू कर दिए।

शिवजी जब उठे तब बाणासुर की सेना पर कहर टूट चुका था। इससे क्रोधित होकर उन्होंने ऐसा बाण चलाया जिससे चारों और बीमारियां फैल गईं। इसके जवाब में कृष्ण ने अपना आखिरी शस्त्र चलाया जिससे सभी बीमारियों का नाश हो गया। मगर उसमें इतना तेज था कि संसार का खात्मा होने का डर पैदा हो गया।

इससे भयभीत होकर सभी देवी-देवता और तपस्वीगण ब्रह्माजी के पास पहुंचे। उन्होंने इस युद्ध को तुरंत रोकना की विनती की। ब्रह्माजी ने कहा कि वे इस युद्ध को नहीं रोक सकते हैं। सिर्फ एक ही देवी हैं, जो यह काम कर सकती हैं वो हैं मां दुर्गा। तब ब्रह्माजी ने मां दुर्गा को युद्ध शांत कराने के लिए भेजा।

दुर्गा जब युद्ध क्षेत्र में पहुंचीं तो सभी उनके समक्ष झुक गए। मां दुर्गा ने बाणासुर को समझाया कि उसने गलत तरीके से अनिरुद्ध को कैद कर रखा है। तब बाणासुर ने अपनी गलती मानी और श्रीकृष्ण से माफी मांगी। उसने अनिरुद्ध को अपनी कैद से रिहा कर दिया और अपनी बेटी उषा को उसके साथ खुशी-खुशी विदा कर दिया। फिर श्रीकृष्ण अपने पौत्र अनिरुद्ध और उषा को लेकर द्वारिका वापस लौट गए।

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