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ऐसा दिलखुश मिजाज इंसान, आला दर्जे का पत्रकार और कवि कभी-कभार ही जन्म लेते हैं

ऐसा दिलखुश मिजाज इंसान, आला दर्जे का पत्रकार और कवि कभी-कभार ही जन्म लेते हैं

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New Delhi news : देश की आजादी के पहले और उसके बाद की पत्रकारिता के इस वर्तमान दशक तक के इतिहास को देखा जाए तो उसमें 10 पत्रकारों में खुशवंत सिंह का नाम शुमार होगा। ऐसा मत समझिए कि यह बात केवल भारत के संदर्भ में कहीं जा रही है। इसे विश्व स्तर पर भी देखा जा सकता है कि अपने जमाने में दुनिया के 10 चर्चित पत्रकारों में खुशवंत सिंह शामिल थे। वह इंसान तो अलग किस्म के थे ही, पत्रकार भी बेमिसाल किस्म के थे। वह ऐसे पत्रकार और कवि थे, जिन्हें सिर्फ जन्मतिथि और पुण्यतिथि पर ही याद नहीं किया जाना चाहिए। बेशक 1915 में जन्मे खुशवंत सिंह का निधन 2014 में हो चुका है। लेकिन, पत्रकारिता और साहित्य की दुनिया में वह बराबर याद किए जाते हैं। अब जरा देखते हैं उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि पढ़ाई लिखाई, खासियत और उपलब्धियां को।

वकालत से शुरू किया था करियर

खुशवंत सिंह का जन्म अविभाजित भारत में पंजाब के हदाली में एक सिख परिवार में हुआ था। उन्होंने गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर और कैम्ब्रिज यूनीवर्सिटी लंदन में शिक्षा प्राप्त करने के बाद वहीं से कानून की डिग्री ली। पढ़ाई के क्षेत्र में आरंभ से ही वे अपने स्वच्छंद स्वभाव के कारण बहुत अच्छे नहीं थे। कॉलेज तक की परीक्षाओं में उन्हें प्रायः थर्ड डिविजन से पास हुए। कानून की डिग्री लेने के बाद उन्होंने लाहौर में वकालत शुरू की। उनके पिता सर सोभा सिंह अपने समय के प्रसिद्ध ठेकेदार थे। उस समय सोभा सिंह को आधी दिल्ली का मालिक कहा जाता था। उनका विवाह कंवल मलिक के साथ हुआ था। इनके पुत्र का नाम राहुल सिंह और पुत्री का नाम माला है। एक वकील की हैसियत से करियर शुरू करने वाला यह इंसान भविष्य में दुनिया का बड़ा पत्रकार और अंग्रेजी साहित्य का जाना माना चेहरा बन गया।

पद्म विभूषण को लौटा दिया

खुशवंत सिंह का शुरू से ही राजनीति से गहरा नाता था। उनके चाचा सरदार उज्जवल सिंह पंजाब और तमिलनाडु के राज्यपाल रहे थे। राजनीतिक पृष्ठभूमि की वजह से खुशवंत सिंह भी राजनीति के मैदान में उतरे। खुशवंत सिंह 1980 से 1986 तक राज्य सभा के सदस्य रहे। इस दौरान उन्होंने अपनी बात को हमेशा संसद में रखा। उन्हें 1974 में पद्म भूषण और 2007 में पद्म विभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इंदिरा गांधी के समय में गोल्डन टेंपल में सेना भेजने के मुद्दे पर उन्होंने अपना सम्मान लौटा दिया था।

99 साल की उम्र तक रोज लिखते रहे

ट्रेन टू पाकिस्तान और द कंपनी ऑफ वूमन जैसी बेस्टसेलर किताब लिखने वाले सिंह ने 80 किताबें लिखीं। अपने कॉलम और किताबों में संता-बंता के चरित्र से लोगों को खूब गुदगुदाया भी। जीवन भर उन्हें ऐसे शख्स के रूप पहचाना जाता है, जो लोगों को चेहरे पर मुस्कान ला दे। सब जानते हैं कि वो अपने अंतिम दिनों में कहा करते थे कि जिस्म बूढ़ा हो चुका है, लेकिन आंखों में बदमाशी जिंदा है। उन्होंने अपनी जिंदगी की आखिरी सांस तक उन्होंने लिखना नहीं छोड़ा। वह 99 साल की उम्र तक भी सुबह चार बजे उठ कर लिखना पंसद करते थे।

खुलकर अपनी ही आलोचना करने का साहस

अपनी किताब द लेसंस ऑफ लाइफ में उन्होंने दुख जताया था कि उन्होंने अपने शुरुआती जीवन में कई बुरे काम किए जैसे गोरैया, बत्तख और पहाड़ी कबूतरों को मारना। उन्होंने लिखा है कि मुझे इस बात का भी दुख है कि मैं हमेशा अय्याश व्यक्ति रहा। खुद कहते हैं कि मैंने कभी भी इन भारतीय सिद्धांतों में विश्वास नहीं किया कि मैं महिलाओं को अपनी मां, बहन या बेटी के रूप में सम्मान दूं। अपने प्रति इस तरह का खुलापन विरले लोगों में पाया जाता है।

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