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तब फिल्मों में महिलाएं तो क्या तवायफें भी काम करने से हिचकिचाती थीं, तो दादा साहब ने…

तब फिल्मों में महिलाएं तो क्या तवायफें भी काम करने से हिचकिचाती थीं, तो दादा साहब ने…

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Bollywood News: दादा साहब फालके को भारतीय फ़िल्म इंडस्ट्री का ‘दादा’ कहा जाना गलत नहीं होगा। बात 1913 की है, तब दादा साहब राजा हरिश्चन्द्र की पटकथा पर काम कर रहे थे। इसके लिए उन्हें एक महिला कलाकार की जरूरत थी, जो हरिश्चन्द्र की पत्नी तारामती की भूमिका निभाती, परंतु कोई भी महिला इसके लिए राजी नहीं हुई। यहां तक की गणिकाएं (वेश्याएं) भी फिल्म इसके लिए राजी नहीं हुई। फिर दादा साहब ने एक तरकीब निकाली…

अण्णा सालुंके पुरुष थे और निभाई महिला की भूमिका, रोज मिलते थे पांच रुपये

अण्णा सालुंके से दादा साहब फालके की मुलाकात एक ढाबे में हुई थी जहां दादा चाय पीने रुके थे। वेटर अण्णा जब चाय लेकर दादा के पास पहुंचे तो दादा ने देखा कि उनकी अंगुलियां नाजुक है और चालढाल महिलाओं से मेल खाती है। अण्णा को पांच रुपये महीने मिलते थे। दादा ने पांच रुपये रोज देने का वादा कर अण्णा को अपनी फिल्म की हीरोइन बना दिया।

ओलम्पिया थिएटर मुंबई में 21 अप्रैल 1913 को हुआ था राजा हरिश्चन्द्र का प्रीमियर, 23 दिन चली थी फ़िल्म

राजा हरिश्चन्द्र भारत की पहली फीचर फिल्म माना जाती है। कुछ और फिल्मों के भी दावे थे, लेकिन भारत सरकार ने इसे ही पहली फिल्म माना। राजा हरिश्चन्द्र फिल्म का प्रीमियर ओलम्पिया थिएटर मुंबई में 21 अप्रैल 1913 को हुआ, जिसमें समाज के गणमान्य नागरिक, डॉक्टर, पब्लिक वर्कर, स्कॉलर, जज, समाचार-पत्रों के संपादक आदि को आमंत्रित किया गया। तीन मई 1913 को मुंबई के कोरोनेशन थिएटर में फिल्म रिलीज की गई। उस समय कोई भी फिल्म (मूक फिल्में, शॉर्ट फिल्में) तीन-चार दिन से ज्यादा नहीं चलती थी। राजा हरिश्चन्द्र पूरे 23 दिन चली, जो एक रिकॉर्ड था।
आता था विज्ञापन, जल्दी देखिए टिकट रेट दोगुने होने वाले हैं

तब चार शो हुआ करते थे

शाम 6 बजे, रा‍त 8 बजे, रात 10 बजे और रात 11.45 बजे। ‘द बॉम्बे क्रोनिकल’ में फिल्म का विज्ञापन भी दिया जाता था और उसमें लाइन होती थी कि जल्दी देखिए वरना टिकट रेट दोगुने होने वाले हैं। भारत के कुछ शहरों में प्रदर्शन के बाद इसे लंदन,एनएफ कोलंबो और रंगून में भी दिखाया गया।

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