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🗓️ Sun, Apr 6, 2025 🕒 3:22 PM

लैंगिक असमानता की शर्मनाक अनुभूति !

लैंगिक असमानता की शर्मनाक अनुभूति !

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डाॅ. आकांक्षा चौधरी 

समाज बहुत आगे बढ़ रहा है। हर दिन एक नया आविष्कार, एक नया आयाम हासिल कर रहा है। हम चांद, मंगल, सूरज तक पहुंच चुके हैं। इतना आगे बढ़ चुके हैं। फिर भी जब अपना बचपन याद करती हूं, तो याद आता है, साइकिल से सहेलियों के साथ सहजता से घूमना। कभी सुबह के चार बजे ही मां की पूजा के फूल तोड़ना, कभी रात में आठ बजे घर की बगल की राशन दुकान से नमक खरीद कर ले आना। छोटे से कस्बाई शहर में रहते हुए कभी बगल के चाचाजी, बगल के भैया से डर नहीं लगा। किसी ने हम उड़ती हुईं फ्राक वाली चिड़ियों को कभी ग़लत ढंग से नहीं छुआ। सब तो अपने थे। कोई बाबा, कोई चाचा, कोई शिक्षक, कोई भैया अलग-अलग रूप में अलग-अलग मर्द। मगर, उन्होंने इज्जत दी समाज में हम बच्चियों को आगे बढ़ने के लिए जगह दी।

आज इतने सालों बाद उन सबके प्रति श्रद्धा और बढ़ गयी। मुझे याद है, बढ़ती उम्र में जब छेड़खानी का मतलब नहीं समझती थी, बिल्कुल छोटी अबोध बालिका थी, तो एक जान पहचान वाले ने स्कर्ट छूने की कोशिश की थी। प्रतिकार किया और हल्ला करके दीदी को आवाज लगायी। उसके बाद जो पूरे मुहल्ले से बाप चाचा और भैयाओं ने उस इंसान को पीटा, कि क्या बताऊं ? पहला हिंसक मंज़र था, लेकिन यह समझ में आ गया था कि अच्छे लोग ज्यादा हैं और बुरे लोग कम। बस ! आवाज लगाने की देर है। लेकिन, आज उस घटना के 35 साल बाद, जब राह चलते कोई बेटे की उम्र के लड़के के मुंह से भद्दी विदेशी भाषा में कमेंट सुनती हूं, या कभी किसी ऑटोरिक्शा वाले को साइड मिरर से ताका-झांकी करते देखती हूं, तो रूह कांप जाती है। इसलिए नहीं कि मैं डरती हूं। इसलिए कि यह समाज कहां पहुंच गया है ? क्या हमारे युग, हमारी पीढ़ी ने कुछ अजीब से आविष्कार कर लिये हैं, जो संस्कार और शर्म की परिभाषा बदल रही है ! आखिर ऐसा नैतिक पतन क्यों हो रहा है ?

हम नारी जाति वाली अब और भी दोयम दर्जे की हो चुकी हैं, पुरुष जाति की नज़र में। समानता तो दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही। एक रिक्शा चालक हो, या एक नेता, एक मध्यस्थ पुरुष हो, या एक किशोर ; हर कोई समान रूप से हमारा नैतिक, मानसिक और शारीरिक शोषण कर सकता है। कहीं भी, कभी भी। उन्हें छूट है कुछ भी सोचने की, हमारे फोटो, हमारे विडियो, हम खुद कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। कुछ भी हो सकता है, राजधानी दिल्ली हो या कहीं सुदूर नागालैंड का कोई गांव, औरत तो और भी बेबस ही दिख रही है। जवाब कहीं नहीं, उनकी खूंखार नजरों में ग्लानि कहीं नहीं !!

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