काशी – मथुरा मामले को लेकर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सतर्क, धर्मस्थलों को बचाने का बनाया प्लान, बोला- मस्जिदों का अपमान बर्दाश्त नहीं कर सकते मुसलमान

काशी – मथुरा क़ुतुब मीनार और ताजमहल को लेकर उभरे नए विवाद से ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड को चिंता में डाल दिया है। बोर्ड ने धर्म स्थलों पर उभरे विवाद के बाद इन्हें बचाने के लिए एक नया प्लान भी तैयार कर लिया है। इस बाबत ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने पूजा स्थल अधिनियम 1991 की जांच के लिए कानूनी समिति गठित की है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने ज्ञानवापी मस्जिद से लेकर मथुरा की ईदगाह और दिल्ली के कुतुबमीनार को बचाने के लिए खास प्लान बनाया है, जिसके तहत वो मुस्लिम पक्षकारों को कानूनी मदद देने से लेकर राजनीतिक दबाव तक बनाने का काम करेगा।

नफरत फैलाने वाली ताकतें झूठा प्रोपेगेंडा कर रहीं

बोर्ड कार्यसमिति की आपातकालीन ऑनलाइन बैठक में खासतौर से ज्ञानवापी मस्जिद और देश की विभिन्न मस्जिदों और इमारतों के प्रति सांप्रदायिक ताकतों के रवैये पर विस्तार से चर्चा की गई। बैठक में चर्चा की गई कि एक तरफ नफरत फैलाने वाली ताकतें पूरी ताकत के साथ झूठा प्रोपेगेंडा कर रही हैं और मसलमानों के पवित्र स्थलों को निशाना बना रही हैं। दूसरी तरफ केंद्र सरकार और राज्य सरकारें मूकदर्शक बनी हुई हैं। खुद को धर्मनिरपेक्ष और न्यायप्रिय कहलाने वाले राजनीतिक दल भी खामोश हैं और इस झूठे प्रोपेगंडे के खिलाफ मैदान में नहीं आ रहे हैं।

राजनीतिक पार्टियां अपनी स्थिति स्पष्ट करें

बैठक में मांग की गई कि ऐसे दलों को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। साथ ही देश के संविधान और धर्मनिरपेक्ष चरित्र की रक्षा के लिए स्पष्ट और ठोस आवाज उठाई जाएगी। इस बात पर भी चिंता व्यक्त की गई कि अदालतें भी अल्पसंख्यकों और शोषितों को निराश कर रही हैं। उनके इस रवैये से साम्प्रदायिक ताकतों को प्रोत्साहन मिल रहा है। ज्ञानवापी मामला आज से तीस साल पहले कोर्ट में शुरू हुआ था। हाईकोर्ट के स्टे ऑर्डर के बावजूद इस आदेश की अनदेखी की गई। ज्ञान वापी के खिलाफ बार-बार मुकदमा दायर करना और फिर अदालतों के माध्यम से इस तरह के आदेश जारी करना बहुत निराशाजनक और परेशान करने वाला है।

धर्म स्थलों के रक्षा के लिए बनाई कानूनी समिति

मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड ने प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट-1991 और बाबरी मस्जिद से संबंधित फैसले में इस कानून को सामने रखकर गौर करने और मामले को प्रभावी ढंग से पेश करने के लिए एक कानूनी समिति का गठन किया है। इस कमेटी में जस्टिस शाह मोहम्मद कादरी, यूसुफ हाति मछाला, एमआर शमशाद, फुजैल अहमद अय्यूबी, ताहिर एम. हकीम, नियाज फारूकी, डॉ. कासिम रसूल इलियास और कमल फारूकी शामिल हैं। यह कमेटी विस्तार से मस्जिद से सम्बंधित सभी मुकदमों की समीक्षा करेगी और उचित कार्रवाई करेगी।

जरूरत पड़ी तो जन आंदोलन करेगा बोर्ड

बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि जरूरत पड़ने पर शांतिपूर्ण जन आंदोलन भी शुरू किया जा सकता है। बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि बोर्ड न्यायप्रिय हिंदू भाईयों और दीगर अल्पसंख्यक वर्गों को भरोसे में लेकर धार्मिक स्थलों और पवित्र स्थानों के सम्मान और उनकी सुरक्षा के सम्बंध में संयुक्त जिम्मेदारियों के जनभावना जगाएगा। बैठक में सरकार मांग की गई कि वह पूजा स्थलों से सम्बंधित 1991 के कानून पर अपनी स्थिति स्पष्ट करे। ऐसी घटनाओं पर सरकार की चुप्पी एक आपराधिक कृत्य है, जिसे किसी भी तरह से स्वीकार नहीं किया जा सकता है। बैठक की अध्यक्षता हज़रत मौलाना सैयद मुहम्मद राबे हसनी नदवी साहब ने की। बोर्ड के महासचिव मौलाना खालिद सैफुल्ला रहमानी ने कार्यवाही की अध्यक्षता की। बैठक में बोर्ड के उपाध्यक्ष मौलाना सैयद अरशद मदनी, प्रो. सैयद अली मोहम्मद नकवी, जस्टि शाह मोहम्मद कादरी समेत दीगर पदाधिकारियों और सदस्यों ने शिरकत की।

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