Categories


MENU

We Are Social,
Connect With Us:

☀️
Error
Location unavailable
🗓️ Fri, Apr 4, 2025 🕒 8:29 AM

राज्यसभा में गूंजा जनगणना में देरी का मुद्दा

राज्यसभा में गूंजा जनगणना में देरी का मुद्दा

Share this:

New Delhi news : देश की जनगणना में हो रही देरी का मुद्दा मंगलवार को संसद में गूंजा। कांग्रेस सदस्य एवं नेता विपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने राज्यसभा में शून्यकाल के दौरान यह मुद्दा उठाते हुए कहा कि इससे पहले देश में हर 10 साल पर होनेवाली जनगणना का काम आपात परिस्थितियों और युद्धकाल में भी समय पर किया गया, लेकिन इस बार इसमें अधिक देरी हो रही है।

खड़गे ने कहा कि जनगणना की शुरुआत 1881 में हुई और विपरीत परिस्थितियों में भी यह काम समय पर हुआ। उन्होंने कहा कि 1931 की जनगणना के दौरान जातिगत जनगणना भी करायी गयी थी। उस जनगणना के पहले गांधीजी ने कहा था कि जैसे अपने शरीर की पड़ताल के लिए हमें समय-समय पर चिकित्सा परीक्षण कराना पड़ता है, उसी तरह जनगणना कार्य किसी राष्ट्र का सबसे महत्वपूर्ण परीक्षण होता है। जनगणना बहुत महत्त्व का काम होता है। इसमें काफी बड़ी तादाद में लोग लगते हैं। इसमें जनसंख्या के आंकड़ों समेत रोजगार, पारिवारिक संरचना, सामाजिक-आर्थिक स्थिति और कई प्रमुख पैरामीटर पर डेटा संग्रह करना होता है।

उन्होंने कहा कि दूसरे विश्वयुद्ध और 1971-72 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के बावजूद उस समय जनगणना हुई थी। इतिहास में पहली बार सरकार ने जनगणना में रिकार्ड देरी की है। सरकार को जनगणना के साथ जातिगत गणना भी करानी चाहिए। क्योंकि, आप अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का डेटा संग्रह करते ही हैं, अन्य जातियों का भी कर सकते हैं। इसके बावजूद जातिगत गणना और जनगणना दोनों पर सरकार मौन है। जनगणना के लिए इस साल के बजट में भी केवल 575 करोड़ रुपये का आवंटन किया है।

खड़गे ने कहा कि दुनिया के 81 प्रतिशत देशों ने इस बीच में कोरोना के बावजूद सफलतापूर्वक जनगणना का काम पूरा कर लिया है, क्योंकि जनगणना में देरी के दूरगामी परिणाम होते हैं। तमाम बुनियादी आंकड़ें नहीं होने के कारण नीतियां प्रभावित होती हैं। उपभोक्ता सर्वेक्षण, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण, आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम और राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम सहित कई महत्त्वपूर्ण सर्वेक्षण और कल्याणकारी कार्यक्रम जनगणना के आंकड़ों पर निर्भर करते हैं। उन्होंने कहा कि इस देरी के कारण करोड़ों नागरिक कल्याणकारी योजनाओं की पहुंच से बाहर हो चुके हैं। नीति निर्माताओं के पास अहम फैसला लेने के लिए जरूरी और भरोसेमंद डेटा नहीं है। इसके मद्देनजर वे सरकार से यह निवेदन करते हैं कि तत्काल जनगणना और जातिगत गणना का काम शुरू होना चाहिए।

Share this:

Latest Updates