अबतक कइयों को अपने आगोश में समा चुके रांची-टाटा हाइवे पर तैमारा घाटी से लगभग 10 किलोमीटर अंदर मौजूद दशम फॉल की चर्चा भुतहा फाल के रूप में भी होती है। ग्रामीणों की मानें तो फॉल के इर्द-गिर्द छैला संधु की आत्मा भटक रही है, जिसे स्थानीय लोग देवता की तरह पूजते हैं। ग्रामीणों के अनुसार छैला लोक वादक था, जो विभिन्न आयोजनों पर पास के गांवों में गाना-बजाना करता था।
तब परिजनों ने काट दी थी लता और गहरे जल में समा गया था छैला
ग्रामीण पुरखों से सुनी-सुनाई बातों को दोहराते बताते हैं – सदियों पहले भी फॉल यूं ही बहता था, परंतु वहां न तो सड़कें थीं और न ही आज जैसी सुविधाएं। तब यह क्षेत्र जंगलों व पहाड़ों से पूरी तरह से आच्छादित था। छैला पेड़ की लता के सहारे इस फॉल को ऊपर ही ऊपर पार करता था। आसपास के गांवों में उसकी साख देख उसके घर के ही कुछ लोग जला करते थे।
एक दिन जब वह लता के सहारे फॉल को पार कर रहा था, परिजनों ने लता को काट डाला और छैला गहरे जल में समा गया। तबसे उसकी आत्मा फाल के इर्द-गिर्द भटक रही है।
छैला की दुखी आत्मा का प्रकोप
छैला प्रकृति प्रेमी था, उसे गंदगी से नफरत थी। फाल में डूबने की अधिकांश घटना तब घटी है, जब पर्यटकों ने उसे किसी तरह से प्रदूषित करने की कोशिश की। यही वजह है कि जल में उतरने के पूर्व ग्रामीण छैला संधु (ग्रामीणों की नजर में छैला संधु भगवान) की पूजा करते हैं। चाहे पांच दशक पूर्व संत जॉन के सात बच्चों के डूब जाने की बात हो या फिर पांच यूरोपियन, बीआईटी व गुरुनानक के कई छात्र और दर्जनों पर्यटकों के जलसमाधि लेने की।
फॉल की भौगोलिक संरचना भी कुछ ऐसी है कि डूबने के बाद अन्य जलाशयों की तरह शव के सतह पर आने की संभावना लगभग क्षीण रहती है। कहीं न कहीं यह सब छैला की दुखी आत्मा का ही प्रकोप है, ग्रामीण कहते हैं। हालांकि, प्रशासनिक अमला इन बातों को सिरे से खारिज करता है और इसकी मूल वजह पत्थरों के बीच बनें प्राकृतिक कंदरा, दर्रा आदि को बताता है, जिसमें लाशें फंस जातीं हैं।



