Home
National
International
Jharkhand/Bihar
Health
Career
Entertainment
Sports Samrat
Business
Special
Bright Side
Lifestyle
Literature
Spirituality

धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, भगवान ने इस अधर्मी का नाश करने के लिए…

धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, भगवान ने इस अधर्मी का नाश करने के लिए…

Share this:

Dharm adhyatm : भारतीय परंपरा में धर्म जीवन में धारण करने की प्रवृत्ति मानी जाती है। धर्म संप्रदाय का रूप नहीं है। एक धर्म में कई संप्रदाय हो सकते हैं। यह धर्म की वैचारिकी है। संप्रदायों में आपसी बहस श्रेष्ठ की लड़ाई है। यह लड़ाई मानव अहित के संदर्भ में कभी स्वीकार नहीं की जा सकती। वास्तव में अंग्रेजी का रीलिजन शब्द हमारे धर्म का पर्यायवाची शब्द संस्कारगत धरातल पर नहीं है। धर्म जब संप्रदाय का रूप धारण करने लगता है, तो मानवता का हंता बन जाता है। हमारे यहां धर्म का ईश्वर से अटूट संबंध माना जाता है। ईश्वर की कल्पना ही इस रूप में की गई है कि उसका अवतार होता है और इस अवतार का मूल उद्देश्य धर्म का नाश होता है। हम बचपन से सुनते आए हैं कि धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, विश्व का कल्याण हो और प्राणियों में सद्भावना हो। याद रखिए, मानव सद्भावना के बिना कोई धर्म जिंदा नहीं रह सकता है। धर्म को राजनीति का हथियार बनाने पर वह विनाशकारी भी बन जाता है। हमारी परंपरा में भगवान विष्णु के 10 अवतारों की चर्चा है। 10 अलग-अलग उद्देश्यों के प्रतीक और उसे मानव समाज को अलग-अलग संदेश देने का आधार बताया गया है। जब-जब धर्म की हानि होती है, तब-तब भगवान विष्णु का अवतार होता है। कभी राम के रूप में तो कभी कृष्ण के रूप में भगवान विष्णु का अवतार होने की जानकारी सामान्य रूप से हमारे पास है, लेकिन कभी क्या आपने ध्यान दिया कि नरसिंह रूप में भगवान विष्णु ने अवतार क्यों लिया।

IMG 20250209 WA0038

भगवान विष्णु के चौथे अवतार का उद्देश्य

10 अवतारों में नरसिंह अवतार भगवान विष्णु का चौथा अवतार कहा जाता है। नरसिंह का मतलब नर और सिंह से बना हुआ। आधा नर और आधा सिंह। अत्यंत भयानक रूप।  इस भयावहता का मूल उद्देश्य अत्यंत दुराचारी और धर्म विरोधी हिरण्यकश्यप दैत्य का वध था। उसके बेटे विष्णु भक्त प्रहलाद की रक्षा करना था। प्रहलाद की रक्षा का वास्तविक अर्थ धर्म की रक्षा है। हिरण्यकश्यप और प्रहलाद इस धर्म की रक्षा का माध्यम हैं, केवल पात्र हैं। बताया जाता है कि भगवान विष्णु का यह अवतार इतना ज्यादा विध्वंसक था कि स्वयं उनका भक्त प्रहलाद भी इससे डर गया था। तब भगवान शिव को शरभ अवतार लेकर उन्हें शांत करवाना पड़ा था।

इस प्रकार हुआ हिरण्यकश्यप वध

सतयुग में एक पराक्रमी दैत्य हिरण्यकश्यप हुआ था। उसने कई सैकड़ों वर्षों तक भगवान ब्रह्मा की तपस्या करके अद्भुत वरदान प्राप्त किया था जिसके अनुसार उसका वध भगवान ब्रह्मा के बनाए किसी भी प्राणी से नहीं हो सकता था। वह न अपने घर के अंदर तथा ना ही बाहर, ना दिन में तथा ना ही रात में, ना भूमि पर तथा ना ही आकाश में, ना अस्त्र से तथा ना ही शस्त्र से, ना मनुष्य से तथा ना ही पशु से मारा जा सकता था। इस वरदान को हथियार बनाकर हिरण्यकश्यप ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया था। उसने स्वयं को भगवान घोषित कर दिया तथा विष्णु को मानने से मना कर दिया। इस त्रासदी को खत्म करने के लिए ही भगवान विष्णु को नरसिंह अवतार लेना पड़ा। नरसिंह अवतार ने हिरण्यकश्यप पर भीषण प्रहार किया तथा उसे खींचकर उसके भवन की दहलीज पर ले गए। हिरण्यकश्यप को अपनी जांघों पर बिठा लिया तथा अपने बड़े-बड़े नाखूनों की सहायता से उसका पेट चीरकर आंतड़ियां बाहर निकाल दी। इस प्रकार भगवान नरसिंह ने हिरण्यकश्यप का अंत कर दिया।

IMG 20250209 WA0039

विष्णु भक्त प्रहलाद की रक्षा

कहा जाता है कि जो विष्णु को नहीं मानता था उसके घर में ही उसका बेटा विष्णु भक्त बन गया। जिसके भय से तीनों लोकों में लोग विष्णु का नाम लेने से डर रहे थे, उसी राजा का ही पुत्र दिन-रात विष्णु-विष्णु का नाम ही जपता था। कहानी यह है कि जब वह केवल पांच वर्ष का था तब उसके पिता हिरण्यकश्यप द्वारा उसे मारने के बहुत प्रयास किये गए।  प्रहलाद को सांपों से भरे कारावास में फिंकवा देना, हाथियों के पैरों के नीचे कुचलवाने का प्रयास करना, पहाड़ से नीचे खाई में फेंक देना, अस्त्रों से शरीर के टुकड़े करना, अग्नि में जलाने का प्रयास करना, सब कुछ असफल हो गया। जब जब उसे करने का प्रयास किया गया वास्तव में भगवान विष्णु ने उसकी रक्षा की।

Share this: