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धर्म व सनातन संस्कृति का संरक्षण : दक्षिणापथ

धर्म व सनातन संस्कृति का संरक्षण : दक्षिणापथ

Protection of Dharma and Sanatan Culture : धर्म और सनातन संस्कृति का संरक्षण के बारे में पढ़ें इस बार दक्षिणा पथ-2 में। जब हम लोग 30 दिसंबर की रात चेन्‍नई पहुंचे तो पानी बरस रहा था। उसी के कारण जाम में फंसने के कारण चंद्रशेखर को एयरपोर्ट आने में कुछ मिनट की देरी हुई। हम लोग इंतजार कर रहे थे तो मैने उन्‍हीं की तरह एक व्‍यकि्त देखकर ताली बजाते हुए ध्‍यान खींचना चाहा तो आसपास के लोग मुझे देखने लगे। दिव्‍या ने कहा भी कि पापा क्‍या करते हैं। लोग देख रहे हैं। मैं एक्‍साइटमेंट में अपने को रोक नहीं पाया था। यह भी एक आदिम प्रवृत्ति है। परदेश में अपनों को देखने और मिलने का रोमांच ही अलग होता है। लोग पानी से बचने की कोशिश कर रहे थे। ज्‍योतिर्मय और प्रियंवद को भूख लग रही थी तो वे मैगी तैयार कराने लगे।

सनातन नियमों का कठोरता से पालन

जब हम लोग घर की ओर आ रहे थे तो मैंने कई लोगों को नंगे पैर चलते या बाइक चलाते देखा। उस समय मैने ध्‍यान नहीं दिया और सोचा कि बारिश से जूतों को बचाने के लिए उन्हें खोल लिया होगा। दूसरे दिन चंद्रशेखर ने बताया कि यह खर मास चल रहा है। उसे यहां—मर्गझाई कहा जाता है। इस पूरे महीने बहुत से लोग पूरी निष्‍ठा से नियमों का पालन करते हैं और छौर कर्म नहीं कराते, देव दर्शन करते हैं, घरों में नियमित पूजा अनुष्‍ठान करते हैं और पूर्ण शाकाहारी भोजन करने के साथ ही नंगे पैर रहते हैं। वे आफिस तक नंगे पैर ही जाते हैं। यह प्रथा अयंगरों ‍ब्राह्मणों में अधिक है। वे अति नैष्ठिक हैं और सनातन नियमों का कठोरता से पालन करते हैं। चेन्‍नई में मैलापुर उनकी बस्‍ती है जहां अधिकतर अयंगर ब्राह्मण ही रहते हैं।

कभी अयंगर ब्राह्मणों का ही वर्चस्व था

यदि आप किसी को यह बताएं कि चेन्‍नई के मैलापुर में रहते हैं तो वह सबसे पहले आपको अयंगर ही समझेगा। एक समय अयंगरों का तमिलनाड़ु में वर्चस्‍व था। सभी प्रमुख पदों पर वही थे। प्रशासन में अयंगर प्रणाली प्रचलन में थी। बाद में गैर ब्राह्मणों  ने उनके वर्चस्‍व के विरुद्ध आंदोलन किया और 1916 में जस्टिस पार्टी का गठन किया गया जिसका उद्देश्‍य ही समाज और प्रशासन से उनका वर्चस्‍व खत्‍म करना था। जिसका गहरा असर हुआ धीरे- धीरे समाज से उनका वर्चस्‍व खत्‍म होने लगा।  तमिलनाडु की पूरी राजनीति ही ब्राह्मण के वर्चस्‍व के विरोध पर टिकी है। ब्राह्मणों के भी दो प्रमुख वर्ग हैं। अयंगर और अय्यर। दोनों ही अपने को श्रेष्‍ठ मानते हैं।  यहां तक कि उनके जनेऊ अलग-अलग हैं। कपालीश्‍वर मंदिर के पास एक दूकान पर जब हम लोग जनेऊ खरीदने लगे तो दूकानदार ने पूछा भी कि अयंगर कि अय्यर।

लोग आस्था से करते हैं सनातन धर्म का पालन

हम दोनों का अर्थ नहीं समझते थे। बाद में भाई ने इसे बताया। अयंगर अपेक्षाकृत लंबे,सुंदर और गौर वर्ण के होते हैं जबकि अय्यर कद में छोटे और रंग कुछ दबा होता है। अयंगर अपने को शुद्ध आर्य मानते हैं। उनमें परस्‍पर वैवाहिक संबंध आदि भी कम होते हैं। वैसे ब्राह्मणों में यह बात हर क्षेत्र में देखी जाती है। उत्‍तर भारत में कान्‍यकुब्‍ज, सरयूपारीय का तो पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश में गौड़, सनाढ्य और सारस्‍वत ब्राह्मणों में यही बात है। यहां सनातन धर्म का पालन आस्‍था से किया जाता है। नियम आदि के प्रति इनका समर्पण देखा जा सकता है। तमिलनाडु में वैसे तो सभी हिंदू देवी-देवताओं की पूजा होती है और उनके मंदिर हैं लेकिन तिरुपति के बालाजी, शंकर जी, विनायक (गणेश जी) अंजनेयार-हनुमान जी (मारुति) और मुरुगन (कार्तिकेय) का महत्‍व अधिक है। मुरुगन को सुब्रमण्‍य और अयेप्‍पा भी कहा जाता है। केरल में अयेप्‍पा अधिक लोकप्रिय हैं।

धर्म में आस्था पर जगह पर कब्जा कर धर्मस्थल नहीं

यहां सड़क के किनारे जमीन  कब्‍जा कर मंदिर बनाने जैसी बात कम ही देखने को मिली। यहां वस्‍त्र देख कर भी किसी के आराध्‍य का पता लग जाता है। जैसे- मुरुगन के भक्‍त काला कपड़ा पहनते हैं और मारुति के लाल। पूरे दक्षिण में मुरुगन के भक्‍त अधिक देखने को मिले। वे अपने वाहनों में उनकी मूर्ति या फोटो रखकर चलते हैं। प्रस्‍थान करने के पहले और सकुशल पहुंचने पर उनकी पूजा-प्रार्थना करते हैं। प्रार्थना के मंत्र या पद तमिल में होते हैं। अयंगरों में भी दो पंथ के लोग हैं। एक पूजा में संस्‍कृत के श्‍लोक का पाठ करते हैं जबकि दूसरे उनमें तमिल पद भी जोड़कर दोनों को मिला देते हैं। जैसे उत्‍तर भारत में होता है जहां हिंदी और संस्‍कृत दोनों में पूजा के पद और श्‍लोकों का पाठ होता है।

तमिलनाडु में प्रसाद के रूप में मिले भस्म

मैने तमिलनाडु के जितने भी मंदिर देखे,वहां प्रसाद के रूप में भस्‍म और देवी मंदिरों में सिंदूर या रोली ही मिली। यहां सभी लोग माथे पर भस्‍म लगाते हैं। अलग-अलग पंथ के मानने वालों का भस्‍म लगाने का तरीका भी अलग होता है। यही माथे पर चंदन लगाने को लेकर भी है। हर पंथ के मानने वाले का चंदन लगाने का तरीका अलग है। महिलाएं पुरुषों की तरह लंबा चंदन न लगा कर छोटा लगाती हैं। तिरुपति में जब हम लोगों ने दर्शन के बाद एक महिला से जब चंदन लगवाया तो उसने वहां की पद्धति के अनुसार रामानंदी तिलक -दो लंबे सफेद रेखाओं के बीच लाल रेखा लगाई लेकिन बेटी के माथे पर यही छोटे आकार में लगाई। यह विविधता इसका रहस्‍य न जानने वाले को विस्मित और भ्रमित भी करती है। चंदन लगाने तौर-तरीके पर अलग से पूरा लेख लिखा जा सकता है।

मंदिरों की व्यवस्था केंद्रीकृत

मंदिरों की व्‍यवस्‍था भी केंद्रीकृत होती है। जगह -जगह दान पात्र रखे होते हैं जिन्‍हें वहां हुंडी कहा जाता है। बार-बार लाउडस्‍पीकर से आग्रह किया जा रहा था कि दान हुंडी में ही डालें। किसी के हाथ में न दें। यह अनुशासन तिरुपति में अधिक कड़ाई से पालन किया जा रहा था। वहां हुंडी को भी सफेद कपड़े से इस तरह ढक दिया गया था कि कोई क्या दान दे रहा है,यह कोई देख नहीं पाता। शायद इसी से वहां गुप्‍त दान की परंपरा है। लोग बहुमूल्‍य चीजें बालाजी को दान करते हैं। लेकिन मानव का लालच सब जगह है। कन्‍याकुमारी में सबसे पास के नाम पर 20-20 रुपये लेने के बाद बिना पास सबको अंदर जाने दिया। रुपये जेब में रख लिए। वहां से थोड़ी दूर  तिरुपति मंदिर में भी हुंडी की व्‍यवस्‍था थी लेकिन परिक्रमा के बाद प्रसाद देने वाला धीरे से दक्षिणा जरूर मांग रहा था।

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