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इसरो का स्पेडेक्स मिशन पर जोर, पीएसएलवी-सी60 रॉकेट लॉन्चपैड पर तैनात 

इसरो का स्पेडेक्स मिशन पर जोर, पीएसएलवी-सी60 रॉकेट लॉन्चपैड पर तैनात 

New Delhi News: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) स्पेडेक्स मिशन की पुरजोर तैयारी कर चुका है। पीएसएलवी-सी60 रॉकेट पहले लॉन्चपैड पर तैनात है। उसकी चिपटी नाक में स्पेडेक्स सैटेलाइट रखे हैं। लॉन्चिंग की तारीख बतायी नहीं गयी है। लेकिन, इसरो इसे सम्भवत: 30 दिसम्बर या उसके आसपास कर सकता है।
इस मिशन में दो सैटेलाइट हैं। पहला चेसर, दूसरा टारगेट। चेसर सैटेलाइट टारगेट को पकड़ेगा और उससे डॉकिंग करेगा। इसके अलावा इसमें एक अहम टेस्ट हो सकता है। सैटेलाइट से एक रोबोटिक आर्म निकले, जो हुक के जरिये टारगेट को अपनी ओर खींचेगा। यह टारगेट अलग क्यूबसैट हो सकता है। 
इस प्रयोग से भविष्य में इसरो ऑर्बिट छोड़ अलग दिशा में जा रहे हिस्से को वापस कक्षा में लाने की तकनीक हासिल होगी। साथ ही, ऑर्बिट में सर्विसिंग और रीफ्यूलिंग का ऑप्शन भी खुल जायेगा। स्पेडेक्स तय करेगा कि भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन कैसे बनेगा और चंद्रयान-4 कैसे जायेगा। इस तस्वीर में दाहिने रॉकेट असेंबलिंग यूनिट और बायें लॉन्च पैड है। बीच में पीएसएलवी रॉकेट है, जिसे लॉन्च पैड पर ले जाया जा रहा है। 
स्पेडेक्स मिशन में दो अलग-अलग स्पेसक्राफ्ट को अंतरिक्ष में जोड़ कर दिखाया जायेगा। चंद्रयान-4 के लिए अंतरिक्ष में डॉकिंग बहुत जरूरी तकनीक है। डॉकिंग मतलब जो अलग-अलग हिस्सों को एक-दूसरे की तरफ लाकर उसे जोड़ना है। रॉकेट असेंबलिंग यूनिट से बाहर निकलता पीएसएलवी-सी60 रॉकेट। अंतरिक्ष में दो अलग-अलग चीजों को जोड़ने की ये तकनीक भारत को अपना स्पेस स्टेशन बनाने में मदद करेगी। साथ ही, चंद्रयान-4 प्रोजेक्ट में भी सहायता करेगी। स्पेडेक्स यानी एक ही सैटेलाइट के दो हिस्से होंगे। इन्हें एक ही रॉकेट में रख कर लॉन्च किया जायेगा। अंतरिक्ष में ये दोनों अलग-अलग जगहों पर छोड़े जायेंगे।
भविष्य में इस तकनीक के आधार पर भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन भी बनाया जायेगा। इसके बाद इन दोनों हिस्सों को धरती से निचली कक्षा से जोड़ा जायेगा, ताकि ये फिर एक यूनिट बन जायें। इस पूरे प्रोसेस में कई तरह के काम होंगे ; जैसे दोनों अलग-अलग हिस्से एक-दूसरे को खुद से अंतरिक्ष में खोजेंगे, उनके पास आयेंगे, ताकि एक ही ऑर्बिट में आ सकें। इसके बाद दोनों एक-दूसरे से जुड़ जायेंगे। इस तरह से रॉकेट को बेहद बड़े और मजबूत प्लेटफॉर्म पर रख कर ट्रेन की पटरियों की तरफ खिसकाते हुए लॉन्च पैड तक ले जाते हैं। इसमें काफी समय लगता है। एक बार रॉकेट लॉन्च पैड तक पहुंच जाये, फिर उसकी फ्यूलिंग वगैरह का काम शुरू होता है। यह 24 घंटे के काउंटडाउन के बाद शुरू होता है या यूं कहें कि उसी समय से काउंटडाउन शुरू करते हैं। कई तरह की जांच-पड़ताल होती है। रॉकेट के पूरे सिस्टम चेक किये जाते हैं। 

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