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आम बजट में रेल : रेल कर्मचारी खुश, पर मुसाफिर निराश

आम बजट में रेल : रेल कर्मचारी खुश, पर मुसाफिर निराश

अरविंद कुमार सिंह

वरिष्ठ पत्रकार और पूर्व सलाहकार भारतीय रेल

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन के आम बजट में टैक्स की जो राहत वेतनभोगियों को दी गयी है, उससे रेल कर्मचारी तो खुश हैं पर आम रेल मुसाफिरों के लिए यह बजट बहुत निराशाजनक लग रहा है। पिछले सालों में वित्त मंत्री ने रेलवे पर जो ममता दिखाई थी उसे देखते हुए इस बार रेलवे अधिक धन की प्रतीक्षा कर रहा था लेकिन निराशा ही हाथ लगी। तीन लाख करोड़ रुपए हासिल करने की उम्मीद पाले रेलवे के हिस्से में 2.55 लाख करोड़ रुपए की राशि ही आयी, जो करीब पिछले बजट जितनी ही है।

हालांकि रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा है कि भारत में तेज रफ्तार की ट्रेन ज्याेदा से ज्याैदा हों, इसके लिए अच्छा -खासा प्रावधान है। पर 2025-26 में जो वृद्धि हुई उससे महंगाई की भरपाई भी नहीं हो पाएगी, ये बात पूर्व वित्त मंत्री पी चिदांबरम ने कही है।  

फिलहाल रेलवे को सुरक्षा और संरक्षा के अनिवार्य कामों को पर तो हर हाल में व्यय करना होगा। साथ ही वंदे भारत गाड़ियों से लेकर नमो रेल और कई प्रधानमंत्री की पसंदीदा योजनाओं पर ध्यान देना होगा। बकौल रेल मंत्री 2 से 3 साल में  50 नमो भारत ट्रेन और  200 वंदे भारत चलनी हैं। पर यह उल्लेखनीय बात है कि 2019 के बाद से अब तक केवल 136 वंदे भारत ट्रेन बन सकी हैं।

रेलवे की माल भाड़े से आमदनी 2025-26 में 1.88 करोड़ रुपए और यात्री आमदनी 92,800 करोड़ रुपए होने वाली है। फिर भी कोरोना के बाद बुजुर्गों समेत कई श्रेणियों की खत्म रियायत अभी बहाल नहीं हो सकी है। रेलवे का परिचालन अनुपात भी चिंताजनक और 2025-26 में यह 98.43 फीसदी रहने वाला है।

खुद सृजित धन से रेलवे विकास में खास योगदान देने की स्थिति में नहीं है। इसका कुल रेलगाडी संचालन संबंधी समस्त व्यय बढते हुए 2025-26 में 2.96 लाख करोड़ तक पहुंचने वाला है। रेलवे स्टेशनों के आधुनिकीकरण से लेकर नयी रेल लाइनों, पुलों से लेकर तमाम क्षेत्रों में रेलवे अपेक्षित धन लगाने की हालत में नहीं है। हालांकि बुलेट ट्रेन परियोजना पर सरकार ने जल्दी पूरा करने के इरादे से काफी धन आवंटन किया है, पर आम मुसाफिरों की वैसी चिंता नही है।

अगर मुख्य मदों को देखें तो धन आवंटन में सबसे अधिक रकम पेंशन फंड में 66 हजार करोड़ रुपये रुपए व्यय होगी, जबकि नई लाइनें बिछाने पर 32,235 करोड़ रुपये, कर्मचारी कल्याण पर 833 करोड़ रुपये व्यय होगें। सुरक्षा पर काफी धनराशि व्यय हो रही है। पर रेल पटरियों को दुरुस्त करने के कामों में अपेक्षित बढोत्तरी नहीं हुई, लिहाजा रेलगाड़ियों के पटरी से उतरने के मामले बढ़े हैं।

रेलवे की एक बड़ी चुनौती 7.44 लाख करोड़ रुपए लागत की लंबित परियोजनाएं भी हैं। इसलिए रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती यह है कि मौजूदा वित्तीय स्थिति के बीच वे किस तरह से मुसाफिरों की अपेक्षाओं पर खरे उतरते हैं।

2017-18 में रेल बजट को आम बजट में समाहित करने के दौरान परिकल्पना थी कि रेलवे की तेज प्रगति होगी। पर सबसे अधिक काम सड़कों पर हुआ। कम दूरी और अधिक लाभ देने वाला रेलवे का माल पहले ही सड़कों की ओर जा चुका है। फिर भी अपनी विशिष्टता के कारण रेलवे यात्री और माल यातायात दोनों में सबसे किफायती और पर्यावरण मैत्री बनी हुई है।

आज भी भारतीय रेल के पास न माल की कमी है न ही यात्रियों की।भारतीय रेल की 50% रेल लाइनें 80% बोझा संभाल रही हैं। यही नहीं 25% रेल नेटवर्क पर 100 से 150% यातायात चल रहा है। लोको पायलटों को लंबी डूयूटी करनी पड़ रही है। गैंगमैनों की भी भारी कमी हैं जो रेल पटरियों की देख रेख करते हैं।

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