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श्री काशी विश्वनाथ का गौना उत्सव भव्यता और श्रद्धा का अद्भुत संगम, दरबार में जुटे शिवभक्त

श्री काशी विश्वनाथ का गौना उत्सव भव्यता और श्रद्धा का अद्भुत संगम, दरबार में जुटे शिवभक्त

▪︎ श्री काशी विश्वनाथ धाम में पूरे उल्लास के साथ निभायी गयी हल्दी की रस्म

Varanasi News: श्री काशी विश्वनाथ के गौना उत्सव (रंगभरी एकादशी) की पूर्व संध्या पर रविवार को श्री काशी विश्वनाथ धाम में हल्दी की पारम्परिक रस्म पूरे विधि-विधान और भव्यता के साथ हुई। इस अवसर पर धाम में भक्ति, उल्लास और आस्था का अद्वितीय संगम देखने को मिला। श्रद्धालुओं की अपार भीड़ और भक्तिमय माहौल ने काशी की गलियों को मंगलमय कर दिया।

दरबार में उत्सव की शुरुआत प्रात:काल मथुरा स्थित श्री कृष्ण जन्मस्थल से बाबा विश्वनाथ के लिए भेजी गयी हर्बल अबीर-गुलाल और अन्य उपहार सामग्री के आगमन से हुई। साथ ही, सोनभद्र से आये वनवासी समाज के भक्तों द्वारा भेंट किये गये राजकीय फूल पलाश से निर्मित हर्बल गुलाल को भी बाबा विश्वनाथ के गर्भगृह में अर्पित किया गया। इस पवित्र अनुष्ठान का नेतृत्व मंदिर न्यास के मुख्य कार्यपालक अधिकारी विश्व भूषण मिश्र और डिप्टी कलेक्टर शम्भु शरण ने किया। उन्होंने विधि-विधानपूर्वक श्री विश्वेश्वर का पूजन कर हर्बल गुलाल चढ़ाया, जिससे गर्भगृह का वातावरण भक्तिरस से सराबोर हो गया।

पूजन के उपरांत बाबा विश्वनाथ की चल रजत प्रतिमा की भव्य पालकी यात्रा निकाली गयी, जो मंदिर चौक से होकर गुजरी। इस आलौकिक दृश्य ने श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर दिया। हजारों भक्तों ने इस आध्यात्मिक यात्रा में भाग लेकर बाबा विश्वनाथ और मां गौरा की प्रतिमा पर हल्दी अर्पित की। हल्दी की इस परम्परा को सौभाग्य, मंगलकामना और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है।इस महोत्सव में मथुरा से आये भक्तगण, श्री कृष्ण जन्मस्थली से उपहार लेकर आये श्रद्धालु, इतिहासकार एवं लेखक विक्रम सम्पत और वनवासी समाज के भक्तों ने विशेष रूप से सहभागिता की। उनकी उपस्थिति ने इस आयोजन की भव्यता को और बढ़ा दिया। विभिन्न संस्कृतियों और परम्पराओं के संगम ने काशी की धार्मिक और सांस्कृतिक एकता को सशक्त रूप में प्रस्तुत किया।मंदिर न्यास के अनुसार, यह आयोजन न केवल काशी विश्वनाथ धाम के भक्तों के बीच एकता और आस्था को मजबूत करता है, बल्कि काशी की ऐतिहासिकता और सांस्कृतिक धरोहर को भी सहेजने का प्रयास है। रंगभरी एकादशी महोत्सव का उद्देश्य धार्मिक परम्पराओं को पुनर्जीवित करना और काशी की सनातन संस्कृति को जन-जन तक पहुंचाना है।

तीन दिवसीय लोक उत्सव में दूसरे दिन अलौकिक छटा

इस वर्ष रंगभरी एकादशी को त्रिदिवसीय लोक उत्सव के रूप में मनाया जा रहा है। बीते शनिवार को बाबा विश्वनाथ एवं मां गौरा की चल प्रतिमा को शास्त्रीय अर्चना के साथ मंदिर चौक में शिवार्चनम मंच के निकट तीन दिनों के लिए विराजमान किया गया। इस विशेष आयोजन का उद्देश्य श्रद्धालुओं के बीच धार्मिक और सांस्कृतिक सम्बन्धों को और प्रगाढ़ बनाना है।

काशी की सांस्कृतिक धरोहर का उत्सव

गौना उत्सव के माध्यम से काशी की प्राचीन परम्पराएं और संस्कृति पुनर्जीवित हो रही हैं। यह महोत्सव न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है, बल्कि काशी की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने का एक प्रयास भी है। श्री काशी विश्वनाथ का गौना उत्सव काशी की आस्था, संस्कृति और परम्परा का जीवंत प्रतीक है। य़ह भव्य आयोजन श्रद्धालुओं को काशी की अध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव कराता है।

पंचकोशी यात्रा कर नागा संत पहुंचे काशी विश्वनाथ दरबार, बाबा को अर्पित की हल्दी

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धर्मनगरी काशी में प्रयागराज महाकुम्भ से लौटे श्रीपंचायती महानिर्वाणी अखाड़ा के नागा संतों ने पंचकोशी यात्रा पूरी कर रविवार को श्री काशी विश्वनाथ दरबार में उपस्थिति लगायी। इस दौरान काशी विश्वाथ का दरबार ‘हर-हर महादेव’ और ‘बम-बम भोले’ के जयघोष से गूंज उठा।महानिर्वाणी अखाड़ा के नेतृत्व में संतों ने पांच दिवसीय यात्रा के उपरांत मणिकर्णिका चक्र पुष्कर्णी तीर्थ कुंड में संकल्प का विसर्जन किया। इसके बाद विधि-विधान से बाबा विश्वनाथ के दरबार में दर्शन-पूजन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। नागा संतों ने रंगभरी एकादशी से पूर्व बाबा के गौना की खुशी में उनके रजत विग्रह पर हल्दी और पुष्प अर्पित किये।गौरतलब है कि लगभग 75 किलोमीटर लम्बी इस पंचकोशी परिक्रमा का आरम्भ मणिकर्णिका घाट पर संकल्प लेकर किया गया था। महाकुम्भ में अमृत स्नान के बाद काशी लौटे नागा साधुओं ने रामेश्वर से पांचों पांडव होते हुए अंतिम पड़ाव कपिलधारा तक यात्रा की। इस दौरान परम्परा अनुसार दर्शन-पूजन के साथ रात्रि विश्राम में भजन-कीर्तन भी किया। अंतत: मणिकर्णिका पहुंच कर यात्रा का संकल्प पूरा किया।

पंचकोशी यात्रा

काशी (वाराणसी) की यह प्राचीन और महत्त्वपूर्ण धार्मिक परम्परा है, जिसमें श्रद्धालु लगभग 80 किलोमीटर की यात्रा करते हैं। इस परिक्रमा का उद्देश्य काशी क्षेत्र के प्रमुख मंदिरों और तीर्थस्थलों का दर्शन कर पुण्य अर्जित करना होता है। परिक्रमा मार्ग में कुल 108 शिवलिंग और अनेक देवी-देवताओं के मंदिर स्थित हैं, जो भक्तों की आस्था का केन्द्र हैं।महाकुम्भ 2025 के समापन के बाद नागा साधु और संत काशी में एकत्रित हुए हैं। परम्परा के अनुसार, महाकुम्भ के स्नान के पश्चात नागा संत काशी आकर बाबा विश्वनाथ के दर्शन और गंगा स्नान करते हैं। इस अवसर पर पंचकोशी परिक्रमा कर वे काशी विश्वनाथ दरबार में होली का उत्सव मनाते हैं और फिर अपने साधना स्थलों, अखाड़ों की ओर प्रस्थान करते

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