Mirzapur news, Vindhyachal Mandir : भारतीय आध्यात्मिक और आस्था की परंपरा में एक दिव्य शक्ति की अनुभूति होती है। हजारों वर्षों से चली आ रही है परंपरा आज भी कायम है और आगे भी यह निर्बाध गति से आगे बढ़ती रहेगी। धर्म और अध्यात्म के बिना मूल भारतीय मानस को समझा नहीं जा सकता है। जब हम अध्यात्म की बातें करते हैं तो उसमें देश में देवी माता के मंदिरों की अद्भुत शक्ति का समावेश हो जाता है। देश में देवी मां के जितने भी मंदिर हैं, उनमें उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में स्थित विंध्याचल मंदिर में तीन देवी माता की उपस्थिति और उनकी दिव्य शक्ति की महिमा अपरंपार है। वास्तव में यह शक्तिशाधना का एक प्रमुख स्थल है।
विंध्यवासिनी, महाकाली और मां शारदा का संगम
विंध्याचल मंदिर में देवी शक्ति के एक अद्भुत त्रिकोण का निर्माण होता है। आदिशक्ति माता विंध्यवासिनी जहां एक तरफ लक्ष्मी रूप में दर्शन देती हैं, तो दूसरी तरफ हैं रक्तासुर का वध करने वाली महाकाली। तीसरी देवी हैं, मां शारदा, जिन्होंने अपने सौम्य रूप में आल्हा-ऊदल जैसे महायोद्धाओं को अमरता का वरदान दिया। इन्हें महालक्ष्मी, महाकाली और मा सरस्वती भी कहा जाता है। विंध्यवासिनी देवी विंध्य पर्वत के ईशान कोण यानी उत्तर पूर्व दिशा में विराजमान हैं, तो महाकाली दक्षिण में। वहीं देवी अष्टभुजा पश्चिम दिशा में प्रतिष्ठित हैं।
तीनों की महिमा अपरंपार
सनातन के ग्रंथों में एक कथा है रक्तासुर वध का। देवी दुर्गा के जिस रूप ने रक्तासुर का वध किया था। देवी दुर्गा का वही चंडी रूप विंध्य पर्वत के दक्षिणी हिस्से में स्थापित है। जिस विंध्य पर्वत की जिस खोह में रक्तासुर का वध हुआ था, देवी काली की मूर्ति वहीं विराजमान है। यहां माता काली का मुख आकाश की ओर खुला हुआ है, जोकि रक्तासुर संग्राम के दौरान का माना जाता है। अष्टभुजा देवी के बारे में जो कथा लोगों को आकर्षित करती है, वो द्वापर युग से जुड़ी हुई है। मथुरा की जेल में वासुदेव जी की जो सातंवीं संतान हुई वो एक कन्या थी, जिसे कंस ने जमीन पर पटकने के लिए उठाया, तो वो आसमान में उड़ गई।
उसी कन्या ने ये भविष्यवाणी की थी कि कंस, मेरे पिता की आठवीं संतान के हाथों ही तुम्हारा वध होगा और वही हुआ। देवी अष्टभुजा को महासरस्वती का रूप मान जाता है। ये शक्ति के साथ ज्ञान की देवी भी मानी जाती हैं। इनका एक स्वरूप विंध्याचल से करीब ढाई सौ किलोमीटर दूर एक ऐसे मंदिर में मिलता है, जो अपने आप में देवी शक्ति का सिद्धिपीठ माना जाता है।
कहीं नहीं दिखता है यह चमत्कार
कहा जाता है कि मैहर के माता शारदा मंदिर की चमत्कारी घटनाओं में यहां आधी रात को बजने वाली घंटियां। अचानक जलने वाली अगरबत्ती की खुशबू और तालाब में रहस्यमयी डुबकी की आवाज। यहां के लोगों के बीच एक किवदंती बन चुके हैं। सबसे दिलचस्प बात ये है, कि मां शारदा के चरणों में आधी रात को जो कमल के फूल चढ़े मिलते हैं। ये फूल देखकर सुबह पुजारी इसलिए भी दंग होते हैं, ये उतने ही मुरझाए होते हैं, जितने 2 से तीन घंटे में ये फूल मुरझाते हैं। इन्हीं सारी रहस्यमयी घटनाओं की वजह से शारदा मंदिर को लेकर ये किवंदिती बलवती होती गई, कि देवी शारदा की पहली पूजा आल्हा ही कर जाते हैं।



