राजीव थेपड़ा
क्या कोई इस शब्द का वास्तविक अर्थ समझता भी है ? मैं इस शब्द को समझने का एक तरीका बताता हूं ! इसे ऐसा समझें कि यह अभी-अभी हमारी-आपकी किसी मां-बहन के साथ घटा हो और अब इससे उपजनेवाले क्रोध को अपने भीतर महसूस कीजिये और उससे भी ज्यादा इस बात को भी महसूस कीजिये कि यह सब घट जाने के बाद आप दुनिया के सबसे ज्यादा विवश जीव हैं, जो अब कुछ नहीं कर सकते। यहां तक कि उस बलात्कारी को कठोर-से-कठोर सज़ा दिलवा कर भी आप उस अस्मत को लौटा नहीं सकते, जो हमारी-आपकी उस मां या बहन ने खोयी है !!
बलात्कार…एक शब्द, एक कृत्य भर नहीं होता। यह धरती का ऐसा सबसे मर्मान्तक अपराध है, जो आदमी नाम का एक खुद को सभ्य कहनेवाला जीव करता है !!और चूंकि यह जीव सदियों से खुद को सभ्य और विवेकशील कहता आ रहा है, इसलिए यह अपराध प्राणी मात्र के लिए और भी भीषणतम अपराध है !!
बलात्कार एक ऐसा कृत्य है, जो हज़ार हत्याओं पर भी भारी है। हत्या में एक जीव को संसार से हमेशा के लिए छुट्टी मिल जाती है, मगर बलात्कार के कारण एक नारी जीवन-भर मरती रहती है। उसकी देह से ज्यादा आत्मा पर चोट लगती है और वह भीतर-ही-भीतर कलपती रहती है। उसकी इस यंत्रणा को दरअसल कोई समझ ही नहीं सकता। यहां तक कि कोई सामान्य स्त्री भी किसी पीड़िता की मानसिक स्थिति को ठीक से नहीं समझ सकती !!
दरअसल, कोई लेखक या बड़े-से-बड़ा संवेदनशील व्यक्ति भी इसे बयां नहीं कर सकता…!! बलात्कार आदमी जात पर नारी के विश्वास को भीषणतम चोट है, जो कभी वापस नहीं लौट सकता। मगर, इससे भी भीषण यह है कि यह भयानक कृत्य इस धरती के कुछ हैवानों द्वारा नाबालिगों और दो-तीन-चार वर्षीया बालिकाओं पर भी किया जाता है !! और तो और, यह नंगा खेल कुछ हैवान एक साथ मिलकर भी खेलते हैं !! इस यातना-इस अत्याचार को सहते वक्त कोई भी बच्ची या नारी क्या सोच रही हो सकती है, यह तक भी हम नहीं सोच सकते और ऐसे हैवानों के बारे में क्या लिखा जाना चाहिए ; सो भी मैं बता पाने में असमर्थ हूं !!
कुल मिला कर आत्मा को घुट-घुट कर मरने पर विवश कर देनेवाले इस दुष्कृत्य करनेवाले दोषियों के साथ क्या किया जाना चाहिए और जो कुछ भी उनके साथ कर दिया जाये, क्या वह उनके अपराध के लिए काफी होगा ??
मगर, यह सिर्फ बलात्कार-भर का मामला भी नहीं है। एक स्त्री अपने तमाम जीवन में नवजात स्थिति से बालिका और बालिका से युवती और युवती से स्त्री बनने की अपनी यात्रा में पुरुष की किन निगाहों की यंत्रणा का सामना करती हुई जीती है और एक बालिका को सड़क पर अपनी छाती-दबाये और आंखे झुकाए क्यों चलना पड़ता है, एक स्त्री क्यों मर्द की असामान्य नज़र और और इसी तरह असामान्य व्यवहार और अंत में बहुत जगह इस असामान्य कृत्य यानी बलात्कार का शिकार बनती है। आखिर एक स्त्री इस सभ्य कहे जानेवाले इंसानी समाज में आंख उठा कर चल क्यों नहीं सकती। इस पर मनन और चिंतन पुरुष और स्त्री ; दोनों को ही करना होगा। इस विषय पर काफी सारे विवाद मैं देख-पढ़-सुन चूका हूं। मगर, यह मेरी नज़र में विवाद नहीं, अपितु आत्म-मंथन का विषय है। बगैर आत्म-मंथन के इसके सुधार की दिशा में एक कदम भी नहीं रखा जा सकता !!
…तो आईये, हम सब अपने भीतर उतरते हैं एक स्त्री को एक अलग दृष्टि से देखने के लिए और वही दृष्टि अपने बच्चों को विरासत में सौंपे, तो यह हमारी ही किन्हीं बच्चियों के लिए अच्छा होगा और वह दृष्टि है स्त्री को एक इंसान समझने की दृष्टि। जी हां ! एक स्त्री को अपनी बपौती या उसे एक वस्तु और उसे अपना जरखरीद गुलाम समझने की मानसिकता ही इसकी जड़ है। उसका कोई विचार, उसका कोई सम्मान, उसकी कोई निजता हमारे भेजे में कभी घुसी ही नहीं है। इसलिए इस कृत्य को करनेवाले के भीतर अक्सर वैसा कोई अपराध भाव नहीं देखा जाता ! स्त्री को बिलकुल अपनी ही तरह का एक इंसान समझना ही इस स्थिति से निकलने का एक सम्यक और सीधा रास्ता है। कुल मिला कर अपने अन्दर झांकना ही इस समस्या का निदान है और यह हमारे खुद के अलावा कोई नहीं कर सकता !



