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मंगल को जन्मे, मंगल ही करते, मंगलमय भगवान, जय हनुमान, हनुमान जी को भी…

मंगल को जन्मे, मंगल ही करते, मंगलमय भगवान, जय हनुमान, हनुमान जी को भी…

Dharm adhyatm : आज से वर्षों पहले टीवी पर एक सीरियल आता था जय हनुमान। उसका टाइटल सॉन्ग था- मंगल को जन्मे, मंगल ही करते मंगलमय भगवान, जय हनुमान। इसके साथ ही याद कीजिए संत शिरोमणि तुलसीदास की रचना हनुमान चालीसा में कहां गया है- बुद्धिहीन तनु जानि के सुमिरौ पवन कुमार। हम हनुमान जी की पूजा खुद को बुद्धिहीन जैसा मान कर करते हैं, ताकि वह हमें सुबुद्धि दें। यह अद्भुत बात है कि हनुमान जी बुद्धि और बाल दोनों के हमारे आराध्य हैं। बल और बुद्धि का मेल बहुत मुश्किल से होता है। मगर मुख्य बात यह है कि ऐसे भगवान को भी अभिमान हो जाता है या यूं कहे उनके अभिमान की जब परीक्षा ली जाती है, तब उनके अभिमान के चूर-चूर होने की स्थिति पैदा हो जाती है। भगवान राम के सबसे बड़े भक्त हनुमान ही माने जाते हैं और जब हनुमान में अभियान हुआ तो बड़े सलीके से भगवान राम ने उनके अभियान को तोड़कर उन्हें सच का एहसास कर दिया जानते हैं। अब जानते हैं इस कथा के बारे में।

कैसे आया हनुमान में अभिमान

अभिमान के जन्म लेने की कहानी यहां से शुरू होती है कि लंका दहन के बाद हनुमान जी घोर गर्जना करते हुए जा रहे थे कि रास्ते में उन्हें बड़ी प्यास लगी। महेंद्राचल पर उन्होंने दृष्टि दौड़ाई तो उनकी दृष्टि एक मुनि पर गई, जो शांत बैठे हुए थे। उनके पास जाकर हनुमान जी ने कहा – मुनिवर! मैं श्रीरामचंद्र का सीतान्वेषण का कार्य करके लौट रहा हूं, मुझे बड़ी प्यास लगी है, थोडा जल दीजिए या किसी जलाशय का पता बताइए।

समझिए कौन हैं यह मुनी

मुनि ने उन्हें तर्जनी उंगली से एक जलाशय की ओर इशारा किया। हनुमान जी सीता की दी हुई चूड़ामणि, मुद्रिका और ब्रह्मा जी का दिया हुआ पत्र – यह सब मुनि के आगे रखकर जल पीने चले गए। इतने में एक दूसरा बंदर आया, उसने इन सभी वस्तुओं को उठाकर मुनि के कमंडलु में डाल दिया। तब तक हनुमान जी भी जल पीकर लौट आए।

अनगिनत बार हुआ रामावतार

अपनी वस्तुओं को वहां न देखकर उन्होंने मुनि से पूछा। मुनि ने भौहों के इशारे से उन्हें कमंडलु की ओर इशारा किया। हनुमान जी ने चुपचाप जाकर कमंडलु में देखा तो ठीक उसी प्रकार की रामनाम अंकित हजारों मुद्रिकाएं दिखाई पड़ीं। अब वे बहुत घबराए। उन्होंने पूछा – ये सब मुद्रिकाएं आपको कहां से मिलीं तथा इनमें मेरी मुद्रिका कौन-सी है। मुनि ने उत्तर दिया – जब-जब श्रीरामावतार होता है और सीता हरण के पश्चात हनुमान जी पता लगाकर लौटते हैं, तब शोध मुद्रिका यहीं छोड़ जाते हैं। वे ही सब मुद्रिकाएं इसमें पड़ी हैं। अब तो हनुमान जी का गर्व गल गया। उन्होंने पूछा मुने! कितने राघव यहां आए हैं। मुनि ने कहा यह तो मुद्रिकाओं की गणना से ही पता चल सकता है।

प्रभु श्री राम ही बन गए मुनी

उक्त स्थिति का सामना करने के बाद हनुमान जी प्रभु श्री राम के पास आए और उन्होंने कहा, प्रभो! मुझसे एक बहुत बड़ा अपराध हो गया है। और फिर सारा वृत्तांत सुना दिया। यह सुनकर प्रभु श्रीराम ने कहा मुनि रूप में तुम्हारे कल्याण के लिए मैंने ही सारा खेल रचा था। देखो, वह मुद्रिका तो मेरी उंगली में ही लगी है। तब हनुमान जी का गर्व सर्वथा नष्ट हो गया। यह कहानी हमें संदेश देती है की बड़ी से बड़ी उपलब्धि के बाद भी अभिमान नहीं करना चाहिए।

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