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तवायफ भी सच्चा प्रेम कर सकती है भाई, यकीन नहीं होता तो पढ़िए यह स्टोरी…

तवायफ भी सच्चा प्रेम कर सकती है भाई, यकीन नहीं होता तो पढ़िए यह स्टोरी…

Patna news: अगर दुनिया के इतिहास में प्रेम कहानियों पर नजर डालें तो हमारे दिमाग में अमूमन रोमियो-जूलियट, लैला-मजनू, सिरी-फरहाद और हीर-रांझा की कहानी तैरने लगती है। प्रेम ऐसा भाव है, जो कब किसके प्रति किसके मन में उभर आए और उसके लिए सब कुछ निसार कर दे, इसके बारे में दावे के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता। तवायफों का इतिहास बताता है कि वह मानवीय रिश्ते से ज्यादा अपने पेशे में यकीन रखती हैं, लेकिन उनके पास भी दिल होता है और किसी ग्राहक के प्रति उनका क्या भाव हो सकता है, यह समझना आसान नहीं है। तवायफ भी सच्चा प्रेम कर सकती है, यह सुनकर बहुत लोग आश्चर्य करेंगे, लेकिन यह सच है की तवायफ के दिल में भी सच्चा प्रेम होता है और इसका उदाहरण जानने के लिए बिहार की राजधानी पटना की एक तवायफ की कहानी से आज हम रूबरू होते हैं। यह कहानी 19वीं और 20वीं सदी के बीच की है। इस तवायफ का नाम है जिया अजीमाबादी। मिर्जा से प्यार करती थी।

गंगा नदी के किनारे खा लिया था जहर

कहा जाता है कि जिया ने अपने प्रेमी मिर्जा की खातिर अपनी जान दे दी। उसने पटना में गंगा नदी के किनारे जहर खाकर अपनी जान दी थी उसे जमाने में उसकी खूबसूरती की चर्चा गली-गली में हुआ करती थी। जिया जन्म से ही तवायफ नहीं थी उसका जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था लेकिन जिंदगी के कठोर हालत में उसे कोठी तक पहुंचा दिया।

मां भी तवायफ थी, जिसने जिया को नृत्य, संगीत और शायरी की बारीकियां सिखाईं। जिया की महफिलें पटना के नवाबों, जमींदारों और अंग्रेज अफसरों के बीच मशहूर थीं। इसी दरमियान एक जमींदार के बेटे से उसको ऐसा प्यार हुआ कि उसके लिए जान कुर्बान कर दी।

1850 से 1870 के बीच का दौरा

जिया का दौर 1850 से 1870 के बीच का है। इतिहास बताता है कि उस दौर में तवायफें केवल नाचने-गाने वाली नहीं थीं, बल्कि उनकी शायरी, अदब और आकर्षण उन्हें समाज के उच्च वर्ग में सम्मानित स्थान दिलाते थे। जिया की जिंदगी में प्रेम तब आया, जब उसकी मुलाक़ात एक युवा शायर और ज़मींदार के बेटे, मिर्ज़ा हसन से हुई।

नशीली आंखों का जादू

जिया की आंखें गहरी और नशीली थीं। चाल किसी नृत्य की लय सी। एक बार जो आंख मिला लेता, वो उसकी यादों में खो जाता। त्वचा चांदनी की तरह चमकती थी। लंबे काले बाल नदी की लहरों की तरह लहराते थे। मुस्कान में एक अजीब सा दर्द और मिठास भारी होती थी। गाने लगे तो सब लोग उसकी आवाज में खो जाते थे।

गजब की थी मिर्जा के प्रति आशिकी

एक दिन महफिल में मिर्जा गजल सुनने आया था गजल सुनते-सुनते उसकी आंखें मुझे आंखें आंखों में डूब गई जिया भी उसकी आंखों में समा गई और इसके बाद दोनों की प्यार की कहानी शुरू हुई। महफिल खत्म होने के बाद मिर्ज़ा ने ज़िया से बात करने की कोशिश की. बस उसी दिन से ज़िया और मिर्जा का एक अनकहा रिश्ता बन गया। दोनों के बीच प्यार पनपने लगा, हालांकि प्यार की ये डगर आसान नहीं थी। ज़िया तवायफ थीं मिर्ज़ा एक ज़मींदार का बेटा। इसलिए दोनों एक दूसरे के नहीं हो सकते। समाज की नज़रों में यह रिश्ता मुमकिन नहीं था। दोनों ने शादी का फैसला किया लेकिन मिर्जा के बाप ने इसे नहीं माना और अंततः जिया को अपने प्रेमी की खातिर जान देनी पड़ी। मिर्जा की शादी हो जाने के बाद जिया ने यह कदम उठाया था।

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