■ सरकार पुरुषों के लिए सीटें आरक्षित नहीं कर सकती
New Delhi News: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को भारतीय सेना की जज एडवोकेट जनरल शाखा में पुरुष और महिला अधिकारियों के लिए 2:1 अनुपात में आरक्षण देने की नीति को रद्द कर दिया। जज एडवोकेट जनरल सेना की कानूनी विंग है, जहां अधिकारी कानूनी सलाह, कोर्ट-मार्शल मामलों और सैनिकों और उनके परिवारों की कानूनी जरूरतों को देखते हैं। दो महिला उम्मीदवारों की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि यह नीति मनमानी है और संविधान के तहत सभी को मिले समानता के अधिकार का उल्लंघन करती है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार केवल पुरुषों के लिए सीटें आरक्षित नहीं कर सकती। महिलाओं की सीटें सीमित करना गलत है। असली जेंडर न्यूट्रैलिटी का मतलब है कि सबसे योग्य उम्मीदवार चुने जायें।
दरअसल, दो महिला उम्मीदवार मेरिट लिस्ट में 4वें और 5वें नम्बर पर थीं, लेकिन महिलाओं के लिए केवल 03 सीटें होने के कारण उन्हें मौका नहीं मिला। जबकि उनसे कम अंक वाले पुरुष उम्मीदवार चुने गये। वहीं, कोर्ट ने एक याचिकाकर्ता को तुरंत सेवा में शामिल करने का आदेश दिया गया, जबकि दूसरी को राहत नहीं मिली, क्योंकि उसने याचिका के दौरान ही नौसेना जॉइन कर ली थी।
कम से कम 50 प्रतिशत सीटें रिजर्व करें
जज एडवोकेट जनरल में कुल 09 पदों में भर्ती होनी थी, इसमें 2:1 अनुपात में आरक्षण के आधार पर 06 पुरुषों और 03 महिलाओं का चयन किया गया। इस पर जस्टिस मनमोहन और जस्टिस दीपांकर दत्ता की बेंच ने कहा कि पिछले सालों में महिलाओं को कम मौके मिलने की भरपाई के लिए कम से कम 50 प्रतिशत सीटें महिलाओं को दी जायेंं, लेकिन अगर महिलाएं पुरुषों से ज्यादा मेरिट में हैं, तो उन्हें 50 प्रतिशत तक ही सीमित करना भी गलत होगा।



