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हम हो जाते हैं थोड़े ज्यादा असहनशील

हम हो जाते हैं थोड़े ज्यादा असहनशील

राजीव थेपड़ा 

we become a little more intolerant : 

हर बार जब हम हो जाते हैं थोड़े ज्यादा असहनशील

तो हो जाते हैं हम और भी ज्यादा और भी अधिक असुरक्षित 

हर बार जब हम अपनी और सुरक्षा के लिए करते हैं कुछ और उपाय

कुछ और बढ़ जाता है तब हमारी जिन्दगी के लिए एक अनजाना भय

हर बार और जब हम कम करते हैं किसी और पर अपना भरोसा

हम खोते जाते हैं जिन्दगी जीने के लिए एक जरूरी आत्मविश्वास

हर बार जब घट जाती है हमारे भीतर से कुछ मोहब्बत 

ओह तब ! धरती पर से कम हो जाता है एक और इंसान !!

निकाल कर बाहर पटक देता हूं अपना दर्द

मुझसे से दो फुट दूर बिखरा हुआ मेरा दर्द

किसी अजन्मे गर्भस्थ शिशु की तरह छटपटाता हुआ दिखाई देता है !

घटनाओं और परिस्थितियों के सहवास से पैदा होता है हमारे भीतर दर्द 

अपनी संवेदना, अपनी पुचकार, 

अपनी सहानुभूति से पालते हैं हम उसे !

दर्द बढ़ता जाता है, बढ़ता जाता है और

हमारे ही भीतर कहीं और व्यस्क हो जाता है !

हर चीज पाली नहीं जा सकती

पाली जानी भी नहीं चाहिए

किन्तु हम ऐसा करते हैं !! 

और उसका परिणाम हमारे ही संताप के रूप में 

हमें चारों तरफ से घेर कर जकड़ लेता है !!

दर्द अकेला नहीं आता !

अपने साथ है असुरक्षा, भय 

और ना जाने कितनी ही दूसरी चीजें  

जो हमारा आत्मबल, 

हमारा आत्मविश्वास तोड़ती चली जाती हैं !

दर्द के साथ सबसे अच्छा रवैया यही है कि

दर्द का गला घोंट दो किसी शत्रु की तरह

उसी वक्त, जब पहली बार देखो उसका डिम्ब

दर्द ज़िन्दगी नहीं मित्रों 

उसका सिर्फ इक छोटा-सा हिस्सा भर ही है 

उसका फ़ायदा बस इतना-सा भर है कि 

आप सीख सकते हो उससे कुछ 

और मजबूत बन सकते हो उसके प्रति 

शायद तुम्हें पता भी हो कि धरती के इस जंगल में 

सिर्फ ताकतवर को ही जिन्दा रहना है 

और हर बड़ी मछली को खा जाना है, 

अपने से छोटी मछली को 

तो फिर एक यही सलाह दे सकता हूं तुम्हें  

कि तुम भी इस दर्द से कमजोरी ना बनाओ 

बल्कि इसको भी अपनी ताकत बना लो 

और सच बताता हूं, उसके बाद तुम्हें हरा ना सकेगी 

दुनिया की कोई भी बड़ी से बड़ी ताकत !!

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