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क्या अमेरिकी वोटर रचेंगे इतिहास, सुपर पावर को मिलेगा भारतीय मूल का पहला राष्ट्रपति ?

क्या अमेरिकी वोटर रचेंगे इतिहास, सुपर पावर को मिलेगा भारतीय मूल का पहला राष्ट्रपति ?

अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के लिए मतदान आज, डेमोक्रेटिक कमला हैरिस और रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप ने झोंकी पूरी ताकत

New Delhi news :  अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव में सिर्फ एक दिन बाकी है। अमेरिकी जनता 5 नवम्बर को अपना नया राष्ट्रपति चुनने के लिए मतदान करेगी। ऐसे में डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार कमला हैरिस और रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। शुरुआती सर्वेक्षणों के मुताबिक कमला हैरिस का पलड़ा कुछ भारी लग रहा है, क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप से खफा कई महत्वपूर्ण हस्तियां भारतीय मूल की कमला हैरिस के साथ एकजुट हो रही हैं। साथ ही हालीवुड के सितारे भी कमला हैरिस को समर्थन देने के लिए आगे आ रहे हैं। इस पृष्ठभूमि में लोगों की यह उत्सुकता और बढ़ गयी है कि क्या अमेरिकी जनता नया इतिहास रचेगी और क्या यह चुनाव अमेरिका को भारतीय मूल का पहला राष्ट्रपति देने जा रहा है ?

भारतीय मूल के मतदाताओं की तादाद काफी है

अमेरिका में भारतीय मूल के मतदाताओं की तादाद काफी है। माना जा रहा है कि उनके वोट कमला हैरिस को ही ज्यादा मिलेंगे, लेकिन भारतीय मूल के मतदाताओं की अहमियत को समझते हुए उनको रिझाने के लिए डोनाल्ड ट्रंप भी काफी सक्रिय हैं। हिंदुओं की तरफदारी वाले उनके कई बयान चर्चा में हैं। हाल ही में डोनाल्ड ट्रंप बांग्लादेश में हिंदू समुदाय पर हो रहे जुल्म का मुद्दा भी उठाया था। भारतीय-अमेरिकी कांग्रेसी राजा कृष्णमूर्ति ने आगामी अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों में भारतीय अमेरिकियों के प्रमुख प्रभाव पर कहा कि उनके वोट प्रमुख राज्यों और राष्ट्रव्यापी, दोनों में चुनाव परिणामों को निर्धारित कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय-अमेरिकी समुदाय व्यावहारिक समस्या-समाधान करने वाले नेताओं की तलाश कर रहा है। ऐसे लोग जो विचारधारा को एक तरफ रखते हैं और यह सुनिश्चित करने के लिए सिद्धांतबद्ध हैं कि हर कोई अमेरिकी सपने का आनंद ले सके।

जहां परिणाम अनिश्चित, वहां ध्यान ज्यादा

फिलहाल दोनों उम्मीदवार उन क्षेत्रों पर सबसे ज्यादा ध्यान दे रहे हैं, जहां परिणाम अनिश्चित हैं। विशेषकर स्विंग स्टेट में उनकी मुहिम चरम पर है। राष्ट्रपति पद के लिए संभावित रूप से सात महत्वपूर्ण स्विंग स्टेट परिणाम निर्धारित करेंगे। इसमें पेंसिल्वेनिया (19 इलेक्टोरल वोट), नॉर्थ कैरोलिना (16), जॉर्जिया (16), मिशिगन (15), एरिजोना (11), विस्कॉन्सिन (10) और नेवादा (6) शामिल हैं। इनमें कुल 93 इलेक्टोरल कॉलेज वोट हैं। ये वे राज्य हैं जहां चुनाव परिणाम अनिश्चित हैं और उम्मीदवारों का इन पर काफी ध्यान है। इन राज्यों में जीतना महत्वपूर्ण हो सकता है। एक सफल उम्मीदवार को उपलब्ध 538 इलेक्टोरल वोटों में से 270 की आवश्यकता होती है। इस चुनाव में मुकाबला इतना कड़ा है कि अभी तक कोई भी उम्मीदवार बड़ी बढ़त बनाते हुए नजर नहीं आ रहा है। खास बात यह भी है कि इस बार के दोनों उम्मीदवारों के नजरिये और प्रशासनिक तौर तरीकों को पूरी दुनिया भलीभांति जानती है। अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव मंगलवार 5 नवंबर 2024 को निर्धारित है। देश में संघीय चुनाव नवंबर के पहले मंगलवार को ही होते हैं जो 19वीं शताब्दी की शुरुआत से ही निर्धारित तिथि है। मूल रूप से राज्यों में अलग-अलग दिनों में चुनाव होते थे, लेकिन 1845 में चुनाव के दिन को पूरे देश में एकीकृत करने के लिए एक कानून पारित किया गया था। नवंबर की शुरुआत इसलिए चुनी गई क्योंकि यह उस समय के मुख्य रूप से कृषि प्रधान समाज के अनुकूल था जिससे किसानों को फसल कटने के बाद यात्रा और रैलियों में शामिल होने के लिए सामान्य मौसम मिलता था।

हैकिंग और विदेशी दखल के डर से छोड़ी ईवीएम

साल 2000 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव। रिपब्लिकन पार्टी के जॉर्ज बुश और डेमोक्रेटिक अल गोर के बीच बेहद कड़ा मुकाबला था। फ्लोरिडा स्टेट जिसकी तरफ झुकता, वो अमेरिका का नया राष्ट्रपति बन सकता था। लेकिन एक गड़बड़ हो गई। उस वक्त पूरे अमेरिका में बैलट पेपर से वोटिंग होती थी। फ्लोरिडा में बैलट पेपर का डिजाइन गलत तरीके से बना दिया गया जिससे कई वोट गलत कैंडिडेट को चले गए। काउंटिंग में कंफ्यूजन हुआ। दोबारा काउंटिंग में बुश 537 वोटों से जीत गए और गोर को राष्ट्रपति पद से हाथ धोना पड़ा। इसके बाद ‘हेल्प अमेरिका वोट एक्ट 2002’ लाया गया। इसमें ईवीएम को बढ़ावा देने की बात कही गई जिससे वोटिंग और काउंटिंग को आसान बनाया जा सके। 2006 में अमेरिका के करीब 60 प्रतिशत इलाकों में ईवीएम का विकल्प मुहैया करा दिया गया। हालांकि हैकिंग और विदेशी दखल के डर से ईवीएम कभी जनता का भरोसा नहीं जीत सकी। 2008 के बाद से ईवीएम के इस्तेमाल में गिरावट होने लगी और आज अमेरिका के सिर्फ पांच प्रतिशत हिस्से में इलेक्ट्रॉनिक मशीन से वोटिंग होती है। बाकी 95 प्रतिशत इलाकों में बैलट पेपर या बैलट मार्किंग डिवाइस से वोटिंग होती है।

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