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… और इस तरह धीरे-धीरे सूर्य उपासना बन गई लोक आस्था का महापर्व छठ

… और इस तरह धीरे-धीरे सूर्य उपासना बन गई लोक आस्था का महापर्व छठ

Chhath puja : इस साल 5 नवंबर से नहाय-खाय के साथ लोक आस्था का महापर्व छठ की शुरुआत हो चुकी है। आज यानी 6 नवंबर को खरना है। 7 नवंबर को अस्ताचलगामी सूर्य को पहला और 8 नवंबर को उगते सूर्य को दूसरा अर्घ्य के साथ यह चार दिवसीय महापर्व संपन्न होगा। चार दिनों तक चलने वाले इस महापर्व को बिहार, यूपी, झारखंड समेत उत्तर भारत के कई राज्यों में मनाया जाता है। यह पर्व सांप्रदायिक सौहार्द को भी प्रदर्शित करता है।

सामाजिक सौहार्द की बेमिसाल परंपरा

अब हम जानते हैं कि सूर्य उपासना की यह पद्धति धीरे-धीरे कैसे लोक आस्था का महापर्व बन गई। हम सब जानते हैं कि कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से सप्तमी तक छठ उत्सव मनाया जाता है। यह त्योहार भगवान सूर्य देव को समर्पित है। चार दिनों तक चलने वाला लोकपर्व छठ अपनी परंपराओं के साथ एकता का भी संदेश देता है। इस पर्व पर हिंदू मुसलमान हर किसी की सहभागिता की झलक दिखती है।

विराट सामाजिक सहभागिता का पर्व

अपनी परंपरा के प्रवाह के साथ आगे बढ़ते हुए छठ ऐसा पर्व बन गया, जिसमें जाति के सारे बंधन टूट जाते हैं। ‘सूप-डाला’ बनाने वाले लोग, किसान, फल सब्जी बेचने वाला दुकानदार, सड़क और घाटों की सफाई करने वाले लोग सबकी अहम भूमिका होती है। यही नहीं, लोकआस्था का महापर्व हिंदू-मुस्लिमों के बंधन को मजबूत करने का काम करता है। पटना में ही मुस्लिम समुदाय की महिलाएं दशकों से मिट्टी के चूल्हे बना रही हैं। इसी चूल्हे पर पूजा का प्रसाद तैयार किया जाता है। खास बात ये कि चूल्हा बनाने वाली महिलाएं महीने भर तक लहसुन, प्याज और मांसाहारी भोजन त्याग देती हैं। तो इस प्रकाश सूर्य उपासना लोकपर्व बन गई।

 किसी पुरोहित की जरूरत नहीं

लोक आस्था के इसमहापर्व में सूर्य और उनकी बहन छठी मइया की पूजा होती है, जो बच्चों के लालन-पालन की देवी मानी जाती हैं। सूर्य आरोग्य के देवता भी माने जाते हैं तो इस तरह घर परिवार की सुख समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य के लिए छठ उत्सव मनाया जाता है। हिंदू सनातन धर्म में जप और तप का महत्वपूर्ण स्थान है। छठ में अर्घ्य देने के लिए या फिर मंत्रोच्चारण के लिए किसी पुरोहित की जरूरत नहीं होती, बल्कि शुद्ध भाव से भगवान भास्कर को दूध या जल अर्पित कर देते हैं।

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