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क्या आप जानते हैं? संताली आदिवासी कैसे मनाते हैं होली, रंग लगा तो माने जाते हैं अशुद्ध

क्या आप जानते हैं? संताली आदिवासी कैसे मनाते हैं होली, रंग लगा तो माने जाते हैं अशुद्ध

Do you know? How Santali tribals celebrate Holi, if colors are applied then they are considered impure, Santhali aadivasi, festival of Holi, Ranchi news, Jharkhand news : भारत विविधताओं भरा देश है। यहां एक निश्चित दूरी पर भाषा, संस्कृति बदल जाती है। फिर पर्व-त्योहार पर भी इसका प्रभाव पड़ना लाजिमी है। आज हम बात करेंगे संताली आदिवासियों की होली के बारे में। यह समुदाय होली से एक दिन पहले बाहा पर्व मनाता है। प्रकृति पूजक यह समाज इस मौसम में वृक्ष पर लगने वाले कोपल, फल, फूल, मंजर आदि को इस पर्व के बाद ही खाते हैं। यह पर्व दरअसल चैत्र के महीने में मनाए जाने वाले पर्व दिशोम बाहा की शुरुआत मानी जाती है। बाहा पर्व में भाग लेनेवाले ग्रामीणों के लिए रंग पूरी तरह वर्जित माना जाता है। खासकर जबतक बाहा पर्व संपन्न न हो जाए मुख्य पुजारी (नायकी) घर से इसलिए बाहर तक नहीं निकलते हैं कि उन्हें कहीं रंग न लग जाये। नायकी को रंग लग जाना पूरे गांव के लिए अशुभ माना जाता है। 

भिक्षाटन से प्राप्त अनाज की बनती है खिचड़ी, प्रसाद के तौर पर खाता है पूरा गांव

बाहा के अवसर पर ग्राम देवता की पूजा की जाती है। इससे पहले सुबह में जाहेर थान (पूजा स्थल) में पूजा की जाती है, जबकि शाम में उसी स्थल पर जाकर मरांग बुरु (आदिवासियों के देवता) से अच्छी खेती तथा स्वस्थ जीवन की कामना की जाती है। इससे भी पूर्व गांव में भिक्षाटन की परंपरा है। इस दौरान प्राप्त अनाज से खिचड़ी पकती है, जिसका सेवन प्रसाद के तौर पर पूरा गांव करता है। परंपरा के अनुसार महिलाओं को इसे ग्रहण करना वर्जित है।

दी जाती है तीन मुर्गियों की बलि

बाहा में वैसे दंपत्ति जिनकी शादी के एक वर्ष पूरे हो रहे हैं, उस मंडप में जहां, उनकी शादी हुई है, तीन मुर्गियों की बलि देने की प्रथा है। ऐसा कर वे खुशहाल वैवाहिक जीवन और वंश वृद्धि की कामना करते हैं। इन तीन मुर्गियों में से एक जाहेरथान, दूसरा गांव के नाम और तीसरा खुद के नाम पर देने की परंपरा रही है।

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