Dharm adhyatm: हमारे पौराणिक ग्रंथ और उनके पात्र आज भी जीवन के लिए कई प्रकार के संदेश देते हैं। पौराणिक ग्रंथों में राक्षसों की चर्चा अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनके अवगुणों के माध्यम से समाज में लोगों को यह संदेश दिया जाता है कि आदमी के भीतर राक्षस होता है और अगर वह जाग जाए तो विनाश करता है। लेकिन, इसके साथ ही उसके गुणों की ओर भी ध्यान दिलाया गया है कि हम खराब से खराब व्यक्ति के भीतर भी अच्छे गुण देखकर उससे सीख सकते हैं। रामायण भारतीय जीवन का प्रतिनिधित्व ग्रंथ है और इसमें अच्छाई का प्रतिनिधित्व राम तो बुराई का प्रतिनिधित्व रावण करता है। रावण राक्षसी कुल का सबसे बड़ा राजा था। लेकिन, वह अहंकारी था इसलिए उसका विनाश हुआ। राक्षस कुल में अच्छे रक्षा भी थे और आज हम राक्षस कुल के रावण के छोटे भाई कुंभकरण की चर्चा कर रहे हैं।
जन्म से ही विशालकाय था कुंभकरण
रामायण की कथा से हम जानते हैं कि कुंभकरण का बड़ा भाई लंकापति रावण व छोटा भाई विभीषण था। कुंभकरण जन्म से ही अतिविशाल शरीर लेकर पैदा हुआ था तथा समय के साथ-साथ वह और विशाल होता गया। कुंभकरण प्रतिदिन असंख्य लोगों के बराबर भोजन खा जाता था। इस कारण बहुत बार भोजन की कमी हो जाती थी। वह 6 माही जगह रहता था और शेष 6 माह सोया रहता था। आज भी अगर कोई अधिक सोता है, तो गाहे-बगाहे उसे कुंभकरण की संज्ञा दे दी जाती है। देवलोक में इंद्रदेव कुंभकरण से ईर्ष्या करते थे, इसकी जानकारी उसे थी। इसलिए उसने भगवान ब्रह्मा की कठोर तपस्या की और उन्हें प्रसन्न किया।
इस तरह निद्रासन का मिल गया वरदान
कथा में बताया गया हैकी भगवान ब्रह्मा ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिए। कुंभकरण भगवान ब्रह्मा से वरदान में इंद्रासन मांगना चाहता था अर्थात देव इंद्र का आसन जिससे देवलोक पर उसका अधिकार हो जाता। उसी समय देव इंद्र ने सरस्वती माता से सहायता मांगी तो मां सरस्वती कुंभकरण के वरदान मांगते समय उसकी जिव्हा पर बैठ गईं। इस कारण कुंभकरण ने भगवान ब्रह्मा से इंद्रासन की बजाए निद्रासन मांग लिया अर्थात हमेशा सोते रहने का वरदान। भगवान ब्रह्मा ने उसे यह वरदान दे दिया। यह सुनकर तीनो भाई भयभीत हो गए। विनती करने के बाद उसे 6 महीने सोने और 6 महीने जागन का वरदान मिला।
राम को समझ गया नारायण, सीता को लौटाने की कही बात
कथा के अनुसार, रावण ने कुंभकरण को बताया कि किस प्रकार उसने माता सीता का हरण कर लिया है। श्रीराम ने वानर सेना के साथ लंका पर चढ़ाई कर दी है, युद्ध में रावण के कई योद्धा व भाई-बंधु मारे जा चुके है, स्वयं रावण भी श्रीराम के हाथों परास्त हो चुका हैं। इसलिये उसे समय से पहले श्रीराम की सेना के साथ युद्ध करने के लिए जगाया गया है। कुंभकरण को यह आभास हो गया था कि श्रीराम कोई और नही अपितु नारायण का अवतार हैं तथा माता सीता स्वयं मां लक्ष्मी का। उसने भूतकाल में घटित हुई कुछ घटनाओं का उदाहरण देकर रावण को समझाने का प्रयास किया कि वह माता सीता को लौटा दे तथा श्रीराम की शरण में चला जाए।
नारायण के हाथों मरना किया स्वीकार
यह सुनकर रावण ने कुंभकरण पर बहुत क्रोध किया तथा उसे युद्ध में जाने का आदेश दिया। अंत में जब कुंभकरण समझ गया कि अब रावण को समझाने का कोई प्रयास नही तो उसने युद्धभूमि में जाकर नारायण के हाथों मरने का निश्चय किया। यह कहकर वह श्रीराम के साथ युद्ध करने के लिए निकल पड़ा। वह राम के हाथों मरकर अपने निकृष्ट जीवन से मुक्त हो गया।



