New Delhi news : आज के हाईटेक दौर में जब कुछ भी सूचना या जानकारी हासिल करने के लिए आसानी से गूगल उपलब्ध हो तो लोग साहित्य की दुनिया में क्या हो रहा है, इसे जानने के लिए किताबें पढ़ने में बहुत रुचि नहीं रखते हैं। हिंदी साहित्य के आधुनिक इतिहास में जिन महत्वपूर्ण साहित्यकारों की खूब चर्चा होती आई है, उनमें सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन अज्ञेय का नाम बहुत आगे है। अब सवाल उठता है कि आखिर आज के समय
अज्ञेय को लेकर कुछ याद करने या जानने समझने की जरूरत क्या है। याद रखना चाहिए कि साहित्यकार की कृति की प्रासंगिकता हमेशा बनी रहती है, अगर वह अपने युग का प्रतिनिधित्व करता है और अज्ञेय वैसे ही हिंदी के साहित्यकार माने जाते हैं। उन पर तमाम किताबें लिखी गई हैं। हाल में अंग्रेजी में उन पर एक किताब आई है जिसकी समीक्षा चर्चा का केंद्र बनी हुई है।यह पुस्तक है अक्षय मुकुल द्वारा लिखी जीवनी ‘राइटर, रेबेल, सोल्जर, लवर: द मैनी लाइव्ज़ ऑफ अज्ञेय’ उनके जीवन के अनगिनत पहलुओं को तो उभारती ही है।
780 पृष्ठों की किताब
इस पुस्तक में 1925 से 1980 के भारत के राजनीतिक– सामाजिक इतिहास का भी दस्तावेज़ बन जाती है। हाल ही में साहित्यकार अज्ञेय पर पेंगुइन रैंडम हाउस से प्रकाशित 780 पृष्ठों की ‘राइटर, रेबेल, सोल्जर, लवर: द मैनी लाइव्ज़ ऑफ अज्ञेय’ लेखक-पत्रकार अक्षय मुकुल की शोधपरक किताब है, जिसकी तैयारी वह पिछले कई वर्षों से कर रहे थे। हिंदी साहित्य नहीं, बल्कि आधुनिक भारतीय साहित्य और पत्रकारिता की धारा में सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ (1911-1987) का स्थान और योगदान इतना विशिष्ट है कि हिंदी में लिखी कई प्रामाणिक जीवनियों के बाद भी अक्षय मुकुल का यह नया योगदान जरूरी हस्तक्षेप भी लगता है।

लेखक ही नहीं, क्रांतिकारी भी
अज्ञेय ने एक ही जीवन में कई जीवन जिया था। वह स्वतंत्रता आंदोलन में क्रांतिकारी थे, द्वितीय विश्वयुद्ध के समय सेना में शामिल थे। साहित्य और आलोचना के क्षेत्र में युगों के प्रवर्तनकर्ता थे (हिंदी साहित्य में प्रयोगवाद और तार सप्तक के माध्यम से कविता का एक नया युग), भारतीय पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रयोगवादी थे। भारतीय संस्कृति और धर्म के आध्यात्मिक मायनों के खोजी थे। इन सबके ऊपर भारतीय राष्ट्र-राज्य के निर्माण के प्रत्यक्षदर्शी थे। कहने का अर्थ यह कि हिंदी कविता और नई कहानी का वह प्रमुख हस्ताक्षर जिसने साहित्य और जीवन दोनों ही में परंपराओं को तोड़ा, जिसके दर्शन और साहित्य दोनों ही को अपार प्रशंसा और घोर विरोध के दो विपरीत ध्रुवों में आंका गया. इसलिए यह जीवनी अज्ञेय के जीवन के अनगिनत पहलुओं को तो उभारती है ही, 1925 से1980 के भारत के राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास का भी दस्तावेज़ बन जाती है।
विचारक और दार्शनिक की जीवनी
यह किताब एक साहित्यिक जीवनी से अधिक यह एक विचारक-दार्शनिक की भी जीवनी है। जिस पर उसके समय के प्रभाव थे और जिसने अपने समय को प्रभावित किया था। जिसने विदेशों की अपनी लंबी यात्राओं और प्रवासों के अनुभव से नई-नई संस्कृतियों और परंपराओं को समझा, भारतीय कला और दर्शन के संदर्भ को वैश्विक स्तर पर कॉन्फ्रेंसों में, सेमिनारों में प्रतिनिधित्व दिया।
ज्ञानपीठ पुरस्कार
एक लेखक, विद्रोही, सैनिक और प्रेमी की भूमिकाओं में अगर चुनाव किया जाए तो मेरी दृष्टि में अज्ञेय सबसे पहले और सबसे आखिरी एक लेखक थे. ‘आंगन के पार द्वार‘ पर साहित्य अकादमी पुरस्कार और ‘कितनी नावों में कितनी बार‘ काव्य संग्रह पर ज्ञानपीठ पुरस्कार, उनकी रचनात्मक श्रेष्ठता का प्रमाणपत्र मात्र नहीं, बल्कि हिंदी कविता को अज्ञेय के योगदान का महत्व अंकित करता है।



