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आध्यात्मिक ज्ञान देने के साथ बाल विवाह रोकने के प्रयास में जुटे हैं पंडित बुद्धिनाथ झा

आध्यात्मिक ज्ञान देने के साथ बाल विवाह रोकने के प्रयास में जुटे हैं पंडित बुद्धिनाथ झा

Deoghar News: धर्मगुरु की प्रसिद्धि के मूल में उनके आध्यात्मिक ज्ञान, पूजा-पाठ की कला और धार्मिक कर्तव्यों को पूरी निष्ठा से निभाने में निहित होता है। लेकिन, कुछ धर्मगुरु अपने कार्यक्षेत्र में कुछ अलग और प्रभावी काम भी करते हैं, जो उन्हें विशेष पहचान दिलाता है।

झारखंड के देवघर जिले के हरिलाजोड़ी स्थित प्राचीन शिव मंदिर के पंडित बुद्धिनाथ झा एक ऐसे ही धर्मगुरु हैं, जिनकी प्रसिद्धि न केवल उनके धार्मिक ज्ञान के लिए, अपितु बाल विवाह के खिलाफ उनकी सक्रियता के कारण भी है। वह “विवाह रोकनेवाले पंडित जी” के नाम से मशहूर हैं, जो बाल विवाह के खिलाफ अपने मिशन को आगे बढ़ा रहे हैं।

पंडित बुद्धिनाथ झा का कहना है, “पिछले 15 महीनों में हमने लगभग एक दर्जन बाल विवाह को रोका है, जिनमें से दूल्हा या दुल्हन ; दोनों ही नाबालिग थे और कानूनी रूप से विवाह के लिए योग्य नहीं थे।” इन विवाहों को रोकने में उनका सबसे बड़ा हथियार उनका शास्त्रों का ज्ञान और कानून के प्रति जागरूकता है।

हरिलाजोड़ी का शिव मंदिर देवघर जिले के प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक है। यहां लोग विवाह और अन्य धार्मिक अनुष्ठान कराने आते हैं। लेकिन, पंडित जी का फोकस इस बात पर है कि वह किसी भी तरह से बाल विवाह को बढ़ावा न दें। उन्होंने कहा, “दुल्हा-दुल्हन की उम्र कानूनन सही होनी चाहिए और उनके पास आवश्यक प्रमाणपत्र होने चाहिए।” कभी-कभी जरूरी कागजात परिवार दिखाने से मना कर देते हैं, लेकिन पंडित जी उन्हें समझाते हैं कि बाल विवाह भारत में एक अपराध है और इसके खिलाफ सख्त कानून है।

इसके अलावा, पंडित बुद्धिनाथ झा, नागरिक समाज संगठन ‘आश्रय’ के साथ मिल कर बाल विवाह के खिलाफ जागरूकता फैलाने का काम कर रहे हैं। वह बच्चों के अधिकारों के प्रति लोगों को शिक्षित करते हैं और मंदिर में पोस्टर भी लगवाते हैं, ताकि लोग इस विषय पर जागरूक हों। बता दें कि आश्रय, भारत में बच्चों के अधिकारों के लिए काम करनेवाले सबसे बड़े नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (जेआरसी) का सहयोगी है। यह संगठन पंडित जी के साथ मिल कर बाल विवाह के खिलाफ लोगों को जागरूक कर रहा है। जेआरसी नेटवर्क में 250 सहयोगी संगठनों के साथ 434 जिलों में बच्चों के अधिकारों और शिक्षा को बढ़ावा देने का कार्य कर रहा है।

पंडित जी ने एक घटना को याद करते हुए कहा, “एक बार एक परिवार एक लड़की को लेकर आया, जो करीब 15 वर्ष से अधिक की नहीं दिखती थी। जब मैंने उनसे लड़की का आधार कार्ड पूछा, तो वह हिचकिचाये और कहा कि वह तो घर भूल गये। तब तक मुझे समझ में आ चुका था कि ये लोग बाल विवाह कराना चाहते हैं।” उन्होंने परिवार को चेतावनी दी कि अगर इस विवाह के बारे में पुलिस को जानकारी मिली, तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएयेगी। इसके बाद, परिवार ने अपनी बेटी की शादी 18 वर्ष की उम्र होने के बाद ही करने को कहा। इससे पता चलता है कि पंडित जी कितनी गहरी समझ और प्रतिबद्धता से जुड़े हुए हैं।

हालांकि, सभी परिवारों को समझाना इतना आसान नहीं होता। पंडित जी एक और दृष्टांत बताते हैं…”कुछ युवा लड़के एक नाबालिग लड़की से शादी करने के लिए आये थे। जब पंडित जी ने शादी रोक दी, तो वे गुस्से में आ गये। ऐसे मामलों में, पंडित जी ने पास के पुलिस स्टेशन से मदद ली और जब उन्होंने यह कहा कि पुलिस कभी भी आ सकती है, तो वे डर कर वहां से भाग गएये।

पंडित बुद्धिनाथ का मानना है कि एक धर्मगुरु का काम केवल पूजा-अर्चना और शास्त्रों का ज्ञान देना नहीं है, बल्कि समाज को बेहतर बनाना भी है। बाल विवाह न केवल एक कानूनी अपराध है, बल्कि यह समाज के लिए भी एक बहुत बड़ा संकट है। कोई भी धर्म बाल विवाह का समर्थन नहीं करता और यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम इस संदेश को लोगों तक पहुंचायें।

नागरिक समाज संगठन आश्रय की निदेशक दीपा देवी ने कहा, “ पंडित जी का प्रयास और प्रतिबद्धता सराहनीय हैं। पंडित बुद्धिनाथ जैसे धर्मगुरु बाल विवाह के खिलाफ लड़ाई में एक अहम भूमिका निभाते हैं। क्योंकि, उनका समाज पर गहरा प्रभाव होता है और जब वह बोलते हैं, तो लोग सुनते हैं।” इसी तरह यदि सभी धर्मगुरु बाल विवाह के खिलाफ मुहिम में शामिल हो जायें और बिना उम्र सत्यापन के विवाह न करायें, तो जल्द ही बाल विवाह को पूरी तरह से खत्म किया जा सकता है। क्योंकि, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण- 5 (साल 2019-21) के मुताबिक देवघर जिले में बाल विवाह की दर 49.2 प्रतिशत है। यह राष्ट्रीय औसत 23.3 प्रतिशत की तुलना में काफी ज्यादा है।

पंडित बुद्धिनाथ झा ने धर्मगुरुओं के लिए एक आदर्श स्थापित किया है, जो न केवल धार्मिक कर्तव्यों का पालन करते हैं, बल्कि समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए भी काम कर रहे हैं। उनके प्रयासों से यह साबित होता है कि धर्मगुरु सिर्फ पूजा करने तक सीमित नहीं होते, बल्कि वे समाज में जागरूकता फैलाने और बच्चों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए भी कार्य कर सकते हैं।

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