Categories


MENU

We Are Social,
Connect With Us:


Categories


MENU

We Are Social,
Connect With Us:

☀️
–°C
Fetching location…

सारंडा का बदलाव अब दिखने लगा है : सरयू राय

सारंडा का बदलाव अब दिखने लगा है : सरयू राय

सारंडा का बदलता परिदृश्य पर आयोजित सेमिनार में बोले वक्ता

लगातार खनन और वृक्षों की कटाई ने बर्बाद किया सारंडा कोःजस्टिस पाठक

सारंडा के परिप्रेक्ष्य में लोगों को रोजगार देकर जोड़ने की जरूरत है : धीरेंद्र कुमार

खनन विभाग अब बेहद संजीदा हो गया हैःअरुण कुमार

अवैध खनन और वृक्षों की कटाई ने बर्बाद किया सारंडा कोः डी.एस.श्रीवास्तव

खनन, पर्यावरण और विकास ये सब एक-दूसरे के पूरकःसंजीव कुमार

Ranchi news: जमशेदपुर पश्चिमी के विधायक और सारंडा बचाओ अभियान के संयोजक सरयू राय ने कहा है कि अब सारंडा बदल रहा है। यह बदलाव दिख भी रहा है। सारंडा के परिप्रेक्ष्य में भारत सरकार ने अनेक वर्किंग प्लान बनाए। मेटल और माइनिंग की ट्रेडिंग सबके लिए खोल दिये जाने के बाद 2003 के आस-पास इनकी मांग बढ़ गई थी। सारंडा के जितना क्षेत्रफल है, उससे अधिक क्षेत्रफल के लिए खनन हेतु आवेदन खनन विभाग में आ गया था।

यहां रांची प्रेस क्लब में आयोजित सारंडा का बदलता परिदृश्य विषय पर आयोजित सेमिनार में अपने अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने कहा कि जिसने कभी माइनिंग का नाम नहीं सुना था, उसने भी माइनिंग लीज के लिए आवेदन कर दिया था। माइनिंग लीज के जो वास्तविक धारक थे, वे सरफेस रेंट के लिए जरूरी धनराशि जमा करा पाने में असमर्थ थे। माइनिंग सेक्टर में बूम आने के बाद वे अन्य उद्योगपतियों के साथ गठजोड़ करके इसको चलाने लगे। इसके कारण अवैध माइनिंग धड़ल्ले से शुरु हो गई। अवैध माइनिंग के बारे में पूरे भारत में जोरदार चर्चा शुरु हो गई। उसी दरम्यान सारंडा बचाओ अभियान ने एक पीआईएल फाइल किया। इस पीआईएल को फाइल करने में जस्टिस डॉ. एस. एन. पाठक की अहम भूमिका थी। तब वह सीनियर एडवोकेट थे। उन्होंने कोई फीस नहीं ली और साथ में काम करते रहे। उन दिनों डॉ. पाठक सीनियर वकील थे। बाद में जज बने और अब तो रिटायर भी हो गए लेकिन केस अब तक चल रहा है। इसमें हम लोगों की भी कमी रही। हम लोग उदासीन हो गए। इसी कारण कोई फैसला नहीं हो पाया। अभी दिवाकर उपाध्याय यह केस देख रहे हैं।

IMG 20250625 WA0004

सारंडा बचाओ अभियान, नेचर फाउंडेशन और युगांतर प्रकृति के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस सेमिनार में सरयू राय ने कहा कि सरकार के सभी विभागों के सचिव अपने-अपने विभागों के हित देखते हैं। जहां इंटीग्रल सोच की जरूरत होनी चाहिए, वहां डिफरेंट थॉट काम करता है। कोई इंटीग्रल सोच का ध्यान नहीं रखता। यह चिंता का विषय है। सभी विभागों के हित एक-दूसरे के हितकारी नहीं होते। उन्होंने कहा कि सारंडा के मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रुप से राज्य सरकार को निर्देशित किया है कि कंप्लायंस करके 23 जुलाई तक अपनी रिपोर्ट दे दें। हमें लगता है कि झारखंड सरकार के अफसर ऐसा ही करेंगे। उन्होंने कहा कि यदि राष्ट्र के हित में और अधिक खनन जरूरी होगा तो राज्य सरकार अदालत में अपनी बातों को तार्किक तरीके से रखेगी। उन्हें पक्का यकीन है कि न्यायालय उन्हें खनन के लिए जरूर मौका देगी। श्री राय ने कहा कि माइनिंग करना देश के लिए आवश्यक है, विदेशों के लिए नहीं। विदेशों में बेचे जाने के पहले देश की जरूरतों को भी देखने की जरूरत है। श्री राय ने कहा कि सारंडा की इकोलॉजी सुरक्षित हो, यह जरूरी है। पर्यावरण और खनन विभाग में समन्वय की सबसे अधिक आवश्यकता है।

मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति (रिटायर्ड) डा. एस. एन. पाठक ने कहा कि सारंडा जंगल जिसे कभी 700 पहाड़ियों की भूमि के रूप में जाना जाता था, जो हरे स्टील के रूप में जाने जाने वाले ऊँचे शाल के पेड़ों और मजबूत आदिवासी समुदायों से भरा हुआ था। सदियों तक सारंडा को एचओ मुंडा और संथाल लोगों के हाथों संरक्षित और पोषित किया गया था। जंगल सिर्फ पेड़ और जानवर नहीं थे। यह संस्कृति परंपरा और पूर्वी भारत की पारिस्थितिकी के लिए एक महत्वपूर्ण जीवन रेखा थी। लेकिन हाल के दशकों में इसे चुपचाप लेकिन लगातार खनन, वनों की कटाई, विस्थापन और कभी-कभी सिर्फ उदासीनता के कारण नुकसान पहुँचाया गया। एक न्यायाधीश के रूप में मुझे अक्सर विकास की जरूरतों को प्रकृति की रक्षा की जरूरत के खिलाफ तौलना पड़ता है और मैं यह स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूं कि ये दोनों दुश्मन नहीं हैं। सच्चे विकास का मतलब प्रकृति को नष्ट करना नहीं है। इसका मतलब है इसके साथ बढ़ना। माननीय झारखंड उच्च न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक फैसले में स्थिति की गंभीरता को पहचाना और वन संरक्षण कानूनों के उल्लंघन, अपरिवर्तनीय पारिस्थितिक क्षति और आदिवासी समुदायों के अधिकार के संबंध में महत्वपूर्ण टिप्पणी की। हमारा संविधान कहता है कि पर्यावरण की रक्षा करना राज्य और प्रत्येक नागरिक दोनों का कर्तव्य है। इसलिए सारंडा को संरक्षित करना केवल एक स्थानीय मुद्दा नहीं है, यह केवल झारखंड के बारे में नहीं है, यह एक राष्ट्र के रूप में हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।

पूर्व प्रधान वन संरक्षक धीरेंद्र कुमार ने कहा कि वह जब सारंडा का डीएफओ थे, तब वहां सागवान के बहुत सारे पेड़-पौधे थे। उन्हें वहां इसीलिए भेजा गया कि वह सागवान की अंधाधुंध हो रही कटाई को रोकें। उन्होंने स्थानीय नौजवानों को रोजगार दिया और उनसे ही सागवान की कटाई रुकवाई। सारंडा के परिप्रेक्ष्य में लोगों को रोजगार देकर जोड़ने की जरूरत है।

IMG 20250625 WA0005

खनन विभाग के पूर्व उप निदेशक अरुण कुमार ने कहा कि लोगों की यह धारणा बन गई है कि खनन विभाग प्रदूषण फैलाने में सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। यह गलत है। खनन विभाग अब बेहद संजीदा हो गया है। यह अपने कर्तव्यों का पूर्णतः निर्वहन कर रहा है। देश और राज्य की आधारभूत संरचना के विकास में इसका महत्वपूर्ण योगदान है।

प्रख्यात पर्यावरणविद प्रो. डी. एस. श्रीवास्तव ने कहा कि सारंडा 700 पहाड़ों का समूह है जहां अवैध खनन और गलत तरीके से वृक्षों की लगातार कटाई हो रही है। इसी कारण सारंडा बर्बाद हो रहा है। हाथियों का यह शानदार कॉरीडोर था, जिसे तबाह कर दिया गया है। सारंडा से लगे अनेक इलाकों की यही स्थिति है। सारंडा में सेल (स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड) का जो खदान है, उसकी हालत सबसे ज्यादा खराब है, टाटा स्टील के मुकाबले। सेल ने वहां पर माइंस का पहाड़ खड़ा कर दिया है। यह सारंडा की बर्बादी का सबसे अहम कारण है।

पूर्व प्रधान वन संरक्षक लाल रत्नाकर सिंह ने कहा कि 1924 में, जब यहां अंग्रेज थे, उन्होंने 850 किलोमीटर क्षेत्र को सारंडा का नाम दिया। सारंडा बनने के बाद 1968 में सुसंदा वर्किंग प्लान बना था। 1972 में वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट का गठन हुआ था। यह हाथियों के सबसे बेहतरीन आश्रयस्थली है। देश भर मेंहाथियों के लिए इससे शानदार शरणस्थली कोई नहीं। इसके संरक्षण की जरूरत है। मनुष्य और वायरस, ये दो चीजें ऐसे हैं जो पृथ्वी के मूल स्वरूप को बर्बाद कर रहे हैं। सारंडा को खनन और परिवहन ने बर्बाद करने में सबसे अहम भूमिका निभाई है।

पूर्व प्रधान वन संरक्षक एच.एस. गुप्ता ने कहा कि इंसान खुद को सबसे ज्यादा काबिल समझता है। इसका नतीजा यह है कि आज प्राकृतिक स्वरूप अपने मूल रुप में नहीं है। हमारे पास एक से बढ़ कर एक तकनीकी है। उसका इस्तेमाल विवेकपूर्ण तरीके से करना चाहिए।

खनन विभाग के उप निदेशक संजीव कुमार ने कहा कि खनन, पर्यावरण और विकास ये सब एक-दूसरे के पूरक हैं। खनन विभाग ने सारंडा समेत राज्य के अनेक हिस्सों में आजीविका के लिए अनेक कार्य किये हैं। डीएमएफटी फंड प्रारंभ किया ताकि स्थानीय जो लोग हैं, उनका जीवन स्तर सुधर सके। अतिरिक्त प्रधान वन संरक्षक सिद्धार्थ त्रिपाठी ने भी अपनी बात रखी। कार्यक्रम का संचालन युगांतर प्रकृति के अध्यक्ष अंशुल शरण ने किया। स्वागत भाषण प्रो. एमके जमुआर ने किया जबकि विषय प्रवेश डॉ. आर.के. सिंह और धन्यवाद ज्ञापन निरंजन सिंह ने किया।

Share this:

Latest Updates