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…तो चलिए, आज इतिहास के झरोखे से देखते हैं लोक आस्था के महापर्व छठ को…

…तो चलिए, आज इतिहास के झरोखे से देखते हैं लोक आस्था के महापर्व छठ को…

Chhath Puja ka itihaas : इस धरती पर धर्म की दृष्टि से सनातन धर्म जितना पुराना है, छठ महापर्व की परंपरा भी उसकी प्राचीनता से जोड़कर देखी जा सकती है। इतिहास का कदम सनातन धर्म के जन्म के बाद ही आगे बढ़ता है। एक प्रकार से सनातन के गर्भ से इतिहास का जन्म होता है, उसके बाद वह अपना कदम आगे बढ़ता है। पर्व-त्योहार की प्राचीनता की परंपरा छठ महापर्व के रूप में ही सबसे पहली परंपरा मानी जा सकती है। रामायण में छठ उपस्थित है। महाभारत में भी उपस्थित है। लेकिन, इसकी वास्तविक परंपरा इसके पहले से शुरू हो चुकी थी।

कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी और राजा प्रियव्रत 

यह चिरंतन सत्य है कि छठ पूजा कार्तिक शुक्ल पक्ष के षष्ठी को मनाया जाने वाला आस्था का पर्व है। इतिहास के झरोखे से देखें तो चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व से राजा प्रियव्रत की एक पौराणिक कहानी जुड़ी हुई है। इस पौराणिक कहानी के अनुसार, पष्ठी व्रत रखकर और विधि-विधान के साथ छठी माता की पूजा करने के बाद राजा प्रियव्रत का मृत हो चुका पुत्र फिर जीवित हो गया था।

राजा प्रियव्रत के दुख का कारण

 राजा प्रियव्रत बहुत दुखी थे, क्योंकि उनकी कोई संतान नहीं थी। उन्होंने महर्षि कश्यप को अपनी समस्या बताई। महर्षि कश्यप ने उन्हें पुत्रेष्टि यज्ञ कराने की सलाह दी। यज्ञ के दौरान, आहुति के लिए बनाई गई खीर रानी मालिनी को खाने को दी गई। खीर खाने से रानी गर्भवती हुईं और उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया। लेकिन, दुर्भाग्य से बच्चा मृत पैदा हुआ। राजा प्रियव्रत पुत्र के शव को लेकर श्मशान घाट गए और दुख में डूबकर अपने प्राण त्यागने ही वाले थे कि तभी ब्रह्मा जी की मानस पुत्री देवी षष्ठी प्रकट हुईं। देवी ने राजा से कहा, मैं सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हूं, इसलिए मेरा नाम षष्ठी है। तुम मेरी पूजा करो। राजा ने पूजा की और मृत्यु पुत्र जिंदा हो गया।

माता सीता और द्रौपदी ने किया छठ व्रत

 पौराणिक कहानियों के अनुसार, त्रेतायुग में माता सीता और द्वापर युग में द्रौपदी ने छठ पूजा व्रत रखकर सूर्यदेव को अर्ध्य दिया था। रामायण की कहानी के अनुसार, जब रावण का वध करके राम जी देवी सीता और लक्ष्मण जी के साथ अयोध्या वापस लौटे थे, तो माता सीता ने कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी को व्रत रखकर कुल की सुख-शांति के लिए षष्ठी देवी और सूर्यदेव की आराधना की थी। इसके अलावा द्वापर युग में द्रौपदी ने भी अपने पतियों की रक्षा और खोया हुआ राजपाट वापस पाने के लिए षष्ठी का व्रत रखा था।

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